आत्मकथा भाग-1 अंश-16
आगरा में स्वयं को समंजित करने में अर्थात् खपाने में मुझे थोड़ा समय लगा। अपने छोटे मामाजी के समवयस्क लड़के अरुण से प्रायः मेरा झगड़ा चलता रहता था, क्योंकि हम दोनों का स्वभाव ही ऐसा था। इसमें प्रायः मुझे ही डाँट खानी पड़ती थी। कभी-कभी यह झगड़ा बहुत गंभीर रूप ले लेता था। इस झगड़े का अन्त तभी हो पाया, जब हमने अपना अलग मकान किराये पर ले लिया। हालांकि वह उसी मुहल्ले में था।
मेरा स्कूल हमारे घर लोहामंडी से एक मील से भी अधिक (लगभग 2 किमी) दूर पंचकुइयाँ पर था और मुझे वहाँ तक पैदल ही जाना पड़ता था। पैदल जाना मेरे लिए कोई बड़ी समस्या नहीं थी, क्योंकि पैदल चलने का मुझे काफी अभ्यास था और वह अभ्यास अभी तक बना हुआ है। अपनी कक्षा में मैं कदकाठी में सबसे छोटा था, लेकिन पढ़ने-लिखने में काफी आगे भी था। लड़कों ने मेरा नाम ‘चुहिया’ रख छोड़ा था और इसी बात पर उनसे मेरा प्रायः झगड़ा हो जाया करता था। लेकिन कई लड़के ऐसे भी थे, जिनके साथ मेरी अच्छी दोस्ती थी और वे प्रायः झगड़ों में मेरा पक्ष लिया करते थे।
मैं उन दिनों अंग्रेजी में कुछ कमजोर था, हालांकि अपने गाँव के स्कूल में मुझसे ज्यादा अंग्रेजी जानने वाला दूसरा कोई नहीं था। अंग्रेजी के व्याकरण पर मेरा अच्छा अधिकार था, लेकिन मुझे अंग्रेजी के बहुत कम शब्दों का ज्ञान था और साहित्यिक शब्दों में मेरी पैठ लगभग नहीं के बराबर थी। फिर भी मेरी अंग्रेजी औसत से काफी अच्छी थी। अंग्रेजी के हमारे शिक्षक श्री यतीन्द्र नाथ भट्ट थे, जो मुझे बहुत प्यार करते थे और सहयोग देते थे। वे हमारे कक्षाध्यापक भी थे। उन्हीं की कृपा से उस विद्यालय में मेरी आधी फीस माफ हो गयी थी, हालांकि मैं पूरी फीस माफ होने की आशा कर रहा था, पर शायद मेरा सवर्ण होना इसमें आड़े आ गया।
गणित मेरा प्रिय विषय था और इस विषय में मैं पूरी कक्षा में सबसे आगे रहता था। गणित में हमारे अध्यापक थे श्री लक्ष्मी नारायण वशिष्ठ, जिनके नाम के आद्याक्षरों ‘एल.एन.’ को ज्यादातर लड़के प्रायः ‘हेलन’ कहा करते थे। उनका पढ़ाने का तरीका बहुत अच्छा था, लेकिन वे काफी अनुशासनप्रिय भी थे। ऊपर से देखने में वे बहुत कठोर और रूखे थे और हम प्रायः पीठ पीछे उनका मजाक बनाया करते थे। लेकिन एक घटना उन दिनों ऐसी हो गयी कि हमें उनकी महानता के दर्शन हुए।
हुआ यह कि एक दिन हमारा गणित का पीरियड चल रहा था। वशिष्ठ जी पढ़ा ही रहे थे कि एक चपरासी प्रधानाचार्य जी का आदेश लेकर आया कि हमारी कक्षा इस कमरे को छोड़कर पास के ही दूसरे कमरे में चली जाय। यह आदेश सुनते ही लड़कों ने बहुत जोर का शोर मचाया और अपनी-अपनी किताब-कापियाँ उठाकर दूसरे कमरे में जगह घेरने के लिए भाग निकले। हमारे जैसे कुछ लड़के आराम से चलते हुए आये और पीछे की सीटों पर बैठने का स्थान पा सके।
तब तक वह शोर हमारे प्रधानाचार्य श्री पृथ्वी नाथ चतुर्वेदी के कानों तक पहुँच चुका था। वे बहुत ही अनुशासनप्रिय थे, हालांकि दयालु भी थे। लेकिन इस शोर को वे बर्दाश्त नहीं कर सके और कक्षा में आकर पूछने लगे कि शोर क्यों और किसने मचाया है। उस समय वे बहुत ही क्रोध में थे और उनसे कुछ भी कहने का मतलब था अपनी आफत बुलाना। उन्हें देखते ही सारे लड़कों को साँप सूँघ गया और वे थर-थर काँपने लगे। प्रधानाचार्य जी ने कई बार कड़ककर पूछा कि बताइये शोर किसने मचाया है। मगर किसी लड़के ने जबान नहीं खोली, तब उन्होंने सबकी पीठ पर एक-एक बैंत जमाया।
फिर उन्होंने वशिष्ठ जी से डाँटकर कहा कि आप उन लड़कों का नाम बताइये, जिन्होंने शोर मचाया है, नहीं तो यह आपके हक में ठीक नहीं होगा। कक्षा में कई लड़के ऐसे थे जो वशिष्ठ जी को तरह-तरह से तंग किया करते थे। वशिष्ठ जी उन्हें मारते भी थे और प्रायः धमकी भी दिया करते थे कि तुम्हारी शिकायत प्रिंसिपल साहब से करूँगा। अगर वे चाहते और किसी लड़के की तरफ इशारा भी कर देते, तो उस लड़के की जिन्दगी खराब कर सकते थे, लेकिन वे एक शब्द भी नहीं बोले और स्वयं आधा घंटे तक खड़े-खड़े प्रिंसिपल साहब की डाँट खाते रहे।
इस घटना के बाद हमारी नजरों में उनका सम्मान बहुत बढ़ गया था और ज्यादातर लड़कों ने आगे उन्हें परेशान करना लगभग बन्द कर दिया था। उनकी एक विशेषता और थी कि वे बिना किताब के पढ़ाया करते थे। फिर भी कोई नया सवाल उनके सामने आने पर वे तुरन्त बता देते थे कि यह सवाल किस प्रश्नावली में किस नम्बर पर है। उनकी इस याददाश्त से हम बहुत चमत्कृत थे।
विज्ञान के हमारे अध्यापक थे श्री गौरी दत्त शर्मा, जिन्हें सब लोग ‘जीडी’ कहा करते थे। वे भी मेरी तरफ बहुत ध्यान दिया करते थे और प्रायः मेरा पक्ष लिया करते थे। लेकिन उनका पढ़ाने का तरीका कुछ अच्छा नहीं था, अतः ज्यादातर लड़के उनसे प्रायः असंतुष्ट रहते थे।
हमें संस्कृत पढ़ाते थे श्री कोमल प्रसाद शर्मा, जिनका नाम लड़कों ने ‘तिलकधारी’ रख छोड़ा था। मैं संस्कृत में काफी अच्छा था, अतः वे मुझसे बहुत प्रभावित थे।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें