आत्मकथा भाग-1 अंश-15

आगरा जाते समय हमें सबसे ज्यादा चिन्ता अपनी दादी की थी, जिसे हम ‘अम्मा’ कहते थे। हम सोचते थे कि पता नहीं हमारे आगरा जाने के बाद वे किस तरह रहेंगी। उनको आगरा ले जाना भी संभव नहीं था, लेकिन ईश्वर की लीला कुछ ऐसी हुई कि हमारे आगरा जाने के दो-तीन महीने पहले ही अचानक उनका देहान्त हो गया। हमें उनके स्वर्गवास का बहुत दुःख हुआ, लेकिन इसे ईश्वर की इच्छा समझकर संतोष कर लिया।
मेरा कक्षा 8 का परीक्षाफल अभी तक निकला नहीं था, हालांकि मुझे पूरा विश्वास था कि मुझे प्रथम श्रेणी तो मिलेगी ही। लेकिन अनिश्चितता के कारण मन ही मन चिन्तित भी था। उन दिनों हमारे गाँव में कोई अखबार नहीं आता था। अचानक एक दिन गाँव का एक लड़का मेरे पास आया और मेरा रोल नम्बर पूछने लगा मैं समझ गया कि मेरा परीक्षाफल आ गया है। मन ही मन घबराता हुआ और हनुमान जी का नाम लेता हुआ मैं उसके साथ दौड़ पड़ा। जाकर देखा तो मेरा रोल नम्बर प्रथम श्रेणी में दर्ज था। मुझे बेइन्तहा खुशी हुई और इस बात का संतोष भी हुआ कि मैंने अपनी प्रतिष्ठा बचा ली। मैंने तुरन्त घर आकर माताजी और पिताजी के पैर छुए तथा अन्य बड़ों के भी पैर छूकर आशीर्वाद लिया। मुझे उस समय अम्मा की बहुत याद आयी और रोया भी था कि अगर आज अम्मा होती, तो कितनी खुश होती और मैं सबसे पहले उसी के पैर छूकर आशीर्वाद लेता।
कक्षा 8 उत्तीर्ण करने के बाद मुझे अब कक्षा 9 में दाखिला लेने की चिन्ता थी। राजकीय इंटर काॅलेज, आगरा उन दिनों आगरा शहर का सबसे अच्छा माध्यमिक विद्यालय माना जाता था और आज भी माना जाता है। मेरी हार्दिक इच्छा उसी में प्रवेश लेने की थी। अतः अपने बड़े भाईसाहब से कहकर मैंने अपना फार्म भरवा दिया। वहाँ कक्षा 9 में प्रवेश के लिए एक प्रवेश परीक्षा होती थी। मुझे इस बात का कोई अनुमान नहीं था कि प्रवेश परीक्षा किस तरह की होगी। फिर भी बिना तैयारी किये, मैं अपने बड़े भाई श्री गोविन्द स्वरूप के साथ आगरा पहुंँच गया। वहाँ मैं अपनी बुआ के यहाँ ठहरा और टेस्ट वाले दिन बुआजी के लड़के अनिल के साथ जाकर टेस्ट दे भी आया। मैं टेस्ट के समय काफी घबड़ा रहा था। इसके दो कारण थे- पहला तो यह कि उस समय आगरा मेरे लिए एकदम नया-सा था। गाँव के लोगों में शहरों के प्रति कुछ आतंक मिश्रित भावनाएं होती ही हैं, मैं भी इनसे मुक्त नहीं था। दूसरा कारण यह था कि मैं आगरा के शिक्षा स्तर से अनभिज्ञ था और सोचता था कि वहाँ के लड़के कुछ ज्यादा ही प्रतिभाशाली होते होंगे।
उस प्रवेश परीक्षा के आधार पर 300-400 उम्मीदवारों में से लगभग 30-40 छात्र चुने जाने थे, क्योंकि बाकी स्थान उसी विद्यालय के छात्रों के लिए आरक्षित थे। मुझे अपना चुना जाना बहुत मुश्किल लग रहा था, फिर भी मैं जी कड़ा करके परीक्षा दे आया। अपने हिसाब से पर्चे मैंने ज्यादा अच्छे तो नहीं, परन्तु ठीक ही किये थे और पर्चे हो जाने के बाद मुझे आशा थी कि अब तो प्रवेश मिल ही जायेगा। फिर भी मैं मन ही मन यह योजना बनाते हुए वहाँ से बुआ के घर लौटा कि अगर इस काॅलेज में मेरा प्रवेश न हो पाया, तो कहाँ प्रवेश लेना ठीक रहेगा। आगरा के ही दूसरे घटिया काॅलेज में प्रवेश लेने की, बिसावर वाले काॅलेज में पढ़ने की और प्राईवेट हाईस्कूल की परीक्षा देने तक की कल्पनायें मैंने कर डालीं।
तीसरे दिन हमारा परिणाम आने वाला था अर्थात् उन छात्रों की सूची आने वाली थी जिनका प्रवेश स्वीकृत हो गया था। उस दिन प्रातः ही मैं उस काॅलेज में गया और डरते-डरते अपना नाम देखने लगा। मैंने उस सूची को नीचे से देखना शुरू किया, क्योंकि मैं सोच रहा था कि मेरा नाम आया भी होगा तो कहीं नीचे ही होगा। जैसे-जैसे मैं सूची में ऊपर की ओर चढ़ता जा रहा था, वैसे-वैसे मेरी निराशा बढ़ती जा रही थी। परन्तु देखते-देखते मैं ऊपर चलता गया और उस समय मेरे आश्चर्य तथा प्रसन्नता का ठिकाना न रहा, जब मैंने अपना नाम ऊपर से दूसरे नम्बर पर लिखा हुआ देखा। इसका मतलब था कि उन सब लड़कों में से केवल एक लड़का मुझसे ज्यादा अंक उस प्रवेश परीक्षा में ला सका था। मेरी इस सफलता के दो परिणाम हुए। एक, मेरे ऊपर से आगरा की पढ़ाई का आतंक हवा हो चुका था, क्योंकि उसके शिक्षा स्तर की कलई मेरे सामने खुल चुकी थी। दो, मुझमें काफी आत्मविश्वास जागृत हो गया था, जो कि विभिन्न कारणों से प्रायः लुप्त होता जा रहा था।
प्रवेश परीक्षा में सफल होने के बाद मैं अपना स्थानान्तरण प्रमाणपत्र आदि लेने गाँव आ गया। अब तक हमारी माताजी गाँव में ही थीं, अतः कुछ दिनों बाद हम सब पूरी तैयारी करके आगरा आ पहुँचे। आगरा में हमें अपने रहने लायक कोई मकान ढूँढ़ना था जो कि जल्दी मिलना आसान नहीं था। अतः हमने अपने मामाजी के घर में ही ठहरने का निश्चय किया, जहाँ कुछ जगह खाली थी। उस समय वहाँ का वातावरण बहुत ही गमगीन था, क्योंकि हमारे आने से ठीक दो दिन पहले ही उसी घर में हमारी बड़ी मौसी के एक जवान लड़के श्री श्रीचन्द्र का कैंसर से देहान्त हो चुका था। इसलिए हमारा आगरा प्रवास रोने-धोने से प्रारम्भ हुआ और काफी दिनों तक उसी तरह दुःखपूर्ण बना रहा, जिसका प्रमुख कारण था आर्थिक और दूसरा कारण था कलह।
हमारे आगरा आने के कुछ दिनों बाद ही बड़े चाचाजी ने बँटवारा करा लिया। आगरा आने के कारण हमारा खर्च बढ़ ही गया था। आमदनी कम हो जाने के कारण हमारी अर्थव्यवस्था और ज्यादा डगमगाने लगी। पिताजी के ऊपर काफी कर्ज पहले से ही था, खराब आर्थिक स्थिति के कारण वे ब्याज तक चुकाने में असमर्थ थे, अतः कर्जा चढ़ने लगा। हमारे समाज में व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रायः उसकी आर्थिक स्थिति से आंकी जाती है। हमारी आर्थिक स्थिति खराब होते ही हमारे प्रतिष्ठा भी धूमिल होने लगी। कल तक जो लोग हमारे पिता जी के सामने सिर तक उठाकर नहीं चल सकते थे, अब बहस और तू-तड़ाक भी करने लगे। उन्हीं दिनों दो ऐसी घटनायें हो गयीं, जिनसे हमारी रही-सही प्रतिष्ठा भी धूूूल में मिल गयी। वे दोनों घटनायें इस प्रकार थी।
मेरे बड़े भाई श्री राम मूर्ति ने उस वर्ष जीव विज्ञान के साथ इंटरमीडिएट की परीक्षा दी थी, उनका विचार एम.बी.बी.एस. करने अर्थात् डाक्टरी पढ़ने का था, अतः वे उस वर्ष सी.पी.एम.टी. की परीक्षा में बैठे। लेकिन ईश्वर की लीला ही कहिये कि तमाम कोशिशों के बाद भी वे उसमें पास नहीं हो पाये।
दूसरी घटना यह थी कि हमारे सबसे बड़े भाईसाहब श्री महावीर प्रसाद जिन्होंने उस वर्ष बी.एससी. प्रथम वर्ष की परीक्षा दी थी कुछ अंकों से अनुत्तीर्ण अर्थात् फेल हो गये। ‘फेल’ शब्द के साथ यह हमारा पहला साक्षात्कार था। अब तक हम सभी भाई अच्छे नम्बरों से पास होते आये थे और फेल होने वाले दूसरे लड़कों का प्रायः मजाक बनाया करते थे। लेकिन जब स्वयं हमारे बड़े भाईसाहब फेल हुए, तो हमें इसकी त्रासदी का अनुभव हुआ। इस घटना ने हमारी रही-सही प्रतिष्ठा भी धूल में मिला दी। लेकिन कुछ दिनों बाद ईश्वर की कृपा ऐसी हुई कि विश्वविद्यालय ने उस वर्ष फेल होने वाले प्रत्येक विद्यार्थी को 5 कृपांक प्रदान किए, जिनसे हमारे भाईसाहब भी उत्तीर्ण हो गये और उनका एक अमूल्य वर्ष नष्ट होने से बच गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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