आत्मकथा भाग-1 अंश-14

अध्याय-4:  पलायन

क्या पूछता है तू मेरी बरबादियों का हाल?
मुट्ठी में ख़ाक लेके हवा में उड़ा के देख

कक्षा 8 उत्तीर्ण करने के बाद मेरी जिन्दगी में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया। उन दिनों हमारे यहाँ रेडीमेड कपड़ों का काम हुआ करता था। हमारे पिताजी तथा दोनों चाचाजी साझे में ही दुकान चलाया करते थे। दुकान पर कई कारीगर काम करते थे और काफी मात्रा में कपड़ा बिक जाता था। जैसा कि प्रायः होता है घर में कलह भी बनी रहती थी, क्योंकि जहाँ तीन परिवार एक साथ रहेंगे, वहाँ कुछ न कुछ खटपट तो होगी ही। यह बात अवश्य है कि हमारे घर में कलह की मात्रा कुछ अधिक थी, शायद इसीलिए हमारा शारीरिक विकास अधिक नहीं हुआ।

जिस वर्ष मैंने कक्षा आठ की परीक्षा दी थी, उसी वर्ष मेरे बड़े भाई श्री गोविन्द स्वरूप कक्षा 10 की परीक्षा में बैठे थे और उनके पास काॅमर्स के विषय थे। उनसे बड़े भाई श्री राम मूर्ति विज्ञान विषयों से कक्षा 12 की परीक्षा दे रहे थे। ये दोनों हमारे गाँव के पास के ही एक कस्बे बिसावर में श्री बृजेन्द्र जनता इंटर काॅलेज के छात्र थे। उस काॅलेज में उन दिनों इंटर से आगे की पढ़ाई नहीं होती थी और कामर्स की पढ़ाई तो कक्षा 10 के बाद आगे नहीं होती थी। इसलिए दोनों ही भाइयों को किसी दूसरी जगह अपनी आगे की पढ़ाई करनी थी। मेरे सबसे बड़े भाई साहब श्री महावीर प्रसाद एक साल पहले से ही आगरा काॅलेज, आगरा में बी.एससी. में हमारे मामाजी के घर पर रहकर पढ़ रहे थे। बिसावर के काॅलेज का वातावरण मेरे लिए उचित नहीं समझा गया। अतः हम सबका यही विचार बना कि अब सब भाइयों को आगरा जाकर ही आगे की पढ़ाई करनी चाहिए। हमारे साथ माताजी को जाना ही था, क्योंकि चार भाइयों के खाने-पीने की समस्या भी अपने आप में विकराल थी। जब माताजी हमारे साथ जा रही थीं, तो दोनों छोटी बहिनों को भी गाँव में नहीं छोड़ा जा सकता था। अन्त में यही निश्चय हुआ कि पिताजी गाँव में ही रहकर दुकान चलायेंगे और हम सब आगरा जाकर अपनी पढ़ाई करेंगे।

हमारा यह निश्चय उजागर होते ही पूरे घर में तूफान आ गया। बड़े चाचाजी ने शायद सोचा कि अब ये आगरा जा रहे हैं, जिससे खर्चा बढ़ेगा और आर्थिक स्थिति बिगड़ेगी। अतः वे तुरन्त अलग होने की कोशिश करने लगे और हमारे आगरा जाने के दो-तीन माह के अन्दर ही अलग भी हो गये। सिर्फ छोटे चाचाजी और पिताजी उस दुकान को चलाते रहे। बड़े चाचाजी ने अपनी अलग बिक्री करना शुरू कर दिया।

यहाँ यह बता देना अनुचित न होगा कि वह वर्ष हमारे परिवार के लिए घोर आर्थिक संकट का वर्ष था। इसके कई कारण थे सबसे बड़ा कारण तो यह था कि उस वर्ष हमारे गाँव में लगातार तीसरे वर्ष विकराल बाढ़ आ गयी थी, जिससे कि पूरे गाँव की सारी फसल चौपट हो गयी। किसानों की खराब आर्थिक स्थिति का प्रभाव हमारी दुकान पर पड़ना ही था। जब किसानों के पास रुपये ही नहीं थे, तो वे नये कपड़े क्या खरीदते? यहाँ तक कि हमारा उधार का बहुत सारा पैसा भी मारा गया।

दूसरा कारण हमारे पिताजी और माताजी की नजर में यह था कि हमारे बड़े चाचाजी ने हमारी आमदनी का एक हिस्सा चुपचाप छिपाना शुरू कर दिया था, जिसके कारण हमें दुकान में प्रत्यक्षतः घाटा पड़ गया और करीब पन्द्रह हजार रुपये का कर्ज हमारे ऊपर हो गया। उस जमाने में पन्द्रह हजार रुपये बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी।

तीसरा कारण यह था कि उस वर्ष हमारे पिताजी को अचानक बहुत खर्चा करना पड़ गया, क्योंकि एक तो हमारी दादी और सबसे बड़ी बुआ का स्वर्गवास उन्हीं दिनों हो गया था, जिनके क्रिया-कर्म और ब्रह्मभोज में हमारा काफी खर्चा हो गया। दूसरे, पिताजी को कई विवाहों में भात भी देना पड़ा। दुकान के दो हिस्से हो जाने के कारण हमारी आमदनी पर भी बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ा, क्योंकि हमारे ज्यादातर ग्राहक बड़े चाचाजी की ही जान पहचान के थे। बिक्री प्रायः वे ही किया करते थे, पिताजी तो केवल कपड़े काटकर कारीगरों से सिलवाया करते थे।

अचानक आगरा जाने और नये प्रवेशों के कारण भी काफी खर्च सिर पर आ गया था।

कुल मिलाकर हमारी आर्थिक स्थिति ऐसी हो गयी थी कि हमें अपना भविष्य बहुत अंधकारमय लग रहा था। लेकिन संघर्ष के सिवाय कोई रास्ता नहीं था। संतोष की बात इतनी ही थी कि हमारे छोटे चाचाजी अभी भी हमारे साथ थे और उन दोनों भाइयों ने साथ ही रहना तय किया था। यहाँ मैं अपने पिताजी की हिम्मत की दाद दिये बिना नहीं रहूँगा। भारी कर्ज से दबे रहने पर भी और घोर आर्थिक संकट के दिनों में भी उन्होंने हमें कभी हतोत्साहित नहीं किया, बल्कि हमारा उत्साह ही बढ़ाते थे। कई बार जब आर्थिक संकटों के कारण हमारी मानसिक स्थिति बिगड़ जाती थी, तो पिताजी गांव से आकर हमें धैर्य बंधाते थे और कभी-कभी हम भी गाँव चले जाते थे।

किसी ने कहा है कि -
बन जाते हैं सैकड़ों दोस्त जो ज़र पास होता है।
टूट जाता है गरीबी में जो रिश्ता खास होता है।।
अब तक यह हमने केवल पढ़ा ही था लेकिन इन परिस्थितियों में इस बात की सत्यता का पूर्ण आभास हो गया। हमारे गाँव के बहुत से लोग, जो हमारी बुलन्दी के दिनों में चिकनी-चुपड़ी बातें किया करते थे, इन दिनों पीठ पीछे हमारा बहुत मजाक बनाने लगे थे।

लेकिन आगरा जाने का हमारा निश्चय पक्का था और हमें जाना ही था, चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न उठानी पडें।

-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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