आत्मकथा भाग-1 अंश-13
उन दिनों मेरी रुचि बागवानी में भी हो गयी थी। मैंने अपने नौहरे (अर्थात् वह स्थान जहाँ पालतू पशु बांधे जाते हैं) में खाली जगह में कई क्यारियाँ बना ली थीं, जिनमें मैंने कई तरह की चीजें बो रखी थीं और गैंदे की बहुत अच्छी फुलवारी भी बनायी थी। मैं प्रतिदिन मुँह अंधेरे ही उठकर क्यारियाँ देखने भागता था और संतुष्ट हो जाने के बाद ही शौच करने के लिए खेतों की तरफ जाता था। लेकिन तभी एक ऐसी घटना घट गयी कि मेरा उत्साह प्रायः समाप्त हो गया।
हुआ यह कि एक दिन मैं अँधरे में ही क्यारियों के पास आया, तभी मेरा दायां पैर किसी गुदगुदी चीज पर पड़ा, जो मेरे पैर से लिपट गयी थी। मैं चैंक पड़ा और साँप की सम्भावना का ख्याल करके जोर से पैर को झटक दिया। वह चीज दूर गिर पड़ी और मैंने देखा कि वह साँप ही था, लगभग डेढ़-दो फुट का। वह शायद बच्चा था और जहरीला भी नहीं था। हमारे नौहरे के पास ही एक पोखर थी, जिसमें पानी के काफी साँप रहा करते थे। उन्हीं में से कोई शायद रात में इधर चला आया था। साँप को देखते ही मैं डरकर उल्टा भागा और बाहर सो रहे अपने ताऊजी श्री दानीराम को जगा ले गया। वे तुरन्त मेरे साथ अन्दर गये, लेकिन तब तक साँप भाग चुका था। ताऊजी ने मुझे बहुत डांटा कि इतने अँधेरे में यहाँ आने की क्या जरूरत थी। मेरा सारा उत्साह ठंडा हो चुका था, हालांकि क्यारियों की देखभाल मैं बाद में भी करता रहता था।
कक्षा आठ की परीक्षायें जिला शिक्षा परिषद द्वारा ली जाती थी, जिनका केन्द्र कोई अन्य कस्बा हुआ करता था। हमारा केन्द्र हमारे ब्लाक मुख्यालय बल्देव (दाऊजी) में था। लिखित परीक्षा से पहले हमारी पीटी (शारीरिक शिक्षा) की परीक्षा होनी थी। उसके लिए हम बनियान तथा नेकर की ड्रेस में बल्देव गये थे। मैं अपनी कक्षा का कप्तान बनाया गया था, क्योंकि शरीर से कमजोर और छोटे कद का होने के बाद भी शारीरिक शिक्षा में भी मैं ही सर्वोत्तम छात्र माना जाता था। हालांकि हमारे विद्यालय में शारीरिक शिक्षा मात्र कदम ताल और एक दो मामूली व्यायामों तक सीमित थी, क्योंकि शारीरिक शिक्षा पर वहाँ ज्यादा जोर नहीं दिया जाता था। खेलकूद के नाम पर हमें कबड्डी से ज्यादा कुछ नहीं खिलाया जाता था और क्रिकेट, हाकी, बैडमिन्टन, टेनिस आदि का हम नाम भी नहीं जानते थे। लेकिन परीक्षा में हमें लगातार आठ व्यायाम के अभ्यास करके दिखाने थे। लिहाजा यह जिम्मेदारी मेरे ही ऊपर डाली गयी थी कि बिना किसी अभ्यास के सारे छात्रों को मैं आठ तरह के व्यायाम करवा दूँं।
धड़कते दिल से मैंने व्यायाम कराना शुरू किया। पहले चार व्यायाम तो मैंने आसानी से करा दिये जो कि हम प्रायः किया करते थे। तीन और व्यायाम भी मैंने अपने ही मन से बनाकर करा दिये जो कि सफलतापूर्वक हो गये। आठवें व्यायाम के लिए मैंने फिर अपनी बुद्धि का उपयोग किया और अपने विचार से एक सरल और नये तरीके का व्यायाम बना लिया, लेकिन मेरा दुर्भाग्य कि स्वयं दो बार सफलतापूर्वक करके बताने के बाद भी कक्षा के अन्य छात्र इस व्यायाम को नहीं कर सके। दो प्रयासों के बाद मुझे यह छोड़ देना पड़ा तथा आगे का कार्यक्रम चला।
लड़के डर रहे थे कि अब उनके फेल होने की संभावना है लेकिन ईश्वर को धन्यवाद कि परीक्षक ने किसी को भी फेल नहीं किया और मुझे तो सबसे ज्यादा अंक मिले ही। बाद में हमारे शारीरिक शिक्षक श्री बल्लेराम मुंशी जी ने मुझे बताया कि परीक्षक ने उनसे पूछा था- ‘मास्टर जी सच-सच बताना कि आपने उन्हें क्या और कितना सिखाया था? आपका वह मानीटर लड़का तो काफी होशियार मालूम पड़ता था।’ उन्होंने जवाब दिया था- ‘हमने तो कुछ भी नहीं सिखाया था और सारी बात उसी के ऊपर छोड़ दी थी। वैसे वह लड़का हमारे स्कूल का सबसे होशियार लड़का है।’ परीक्षक तब इतना खुश हुआ था कि उसने मुझे सबसे ज्यादा अंक दे दिये। बाद में लड़कों ने मुझे ताने भी मारे कि मैंने उन्हें फेल करा दिया होता, जबकि बात इससे बिल्कुल उल्टी थी।
लिखित परीक्षा के लिए हमें बल्देव में आठ दिन ठहरने का प्रबन्ध करना था। कक्षा के सब लड़के एक साथ ठहरने का निश्चय कर चुके थे तथा अध्यापकों ने भी प्रबन्ध कर दिया था। लेकिन मैंने उनके साथ ठहरना उचित नहीं समझा, क्योंकि मेरी चचेरी बहन मायादेवी भी मेरे साथ पढ़ती थी। वह तथा कक्षा की अन्य लड़कियाँ लड़कों के साथ ठहरना नहीं चाहती थीं। अतः हमने अपना अलग प्रबन्ध किया और सौभाग्य से हमारा प्रयास सफल रहा। सभी पर्चे मेरी आशा के अनुरूप ही सफल रहे तथा कक्षा की तीनों लड़कियाँ - मेरी चचेरी बहन मायादेवी, गाँव की मिडवाइफ की लड़की सावित्री तथा पास के गाँव की एक लड़की गीता देवी- द्वितीय श्रेणी में उत्तीण हुईं। मैं स्वयं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ और सदा की तरह अपनी कक्षा में प्रथम रहा।
हमारे प्रधानाध्यापक श्री मोहन लाल जी शास्त्री ने एक बार हमसे कहा था कि हम अपनी परीक्षाओं के बाद गर्मियों की छुट्टियों में कम से कम एक बार तुलसीकृत रामचरितमानस को पूरा अवश्य पढ़ लें। यह बात मुझे याद रही। मैंने रामचरितमानस, जिसे बोलचाल में गलती से ‘रामायण’ कहा जाता है, पहले भी कई बार पढ़ी थी और काफी चैपाइयाँ और दोहे मुझे कंठस्थ थे (जो कि आज भी हैं), लेकिन पूरी रामायण पढ़ने का मौका पहले कभी नहीं मिला था। अतः मैंने परीक्षा से वापस आते ही सम्पूर्ण रामचरितमानस एक माह में पढ़ लेने का निश्चय कर लिया। मास पारायण के लिए रामचरितमानस को तीस खण्डों में बाँटा गया है और प्रत्येक खण्ड के अन्त में चिह्न भी लगाये गये हैं, अतः मुझे तीस दिन में रामायण पूरी पढ़ लेने में कोई मुश्किल नहीं हुई। यह तो मैं नहीं बता सकता कि मैं रामचरितमानस के गूढ़ रहस्यों को कहाँ तक समझ पाया, लेकिन इतना अवश्य कह सकता हूँ कि इससे मुझे गहरी मानसिक शांति का अनुभव हुआ और साथ में खुशी भी थी कि मैंने अपने गुरु की एक आज्ञा का पालन किया है।
यहाँ यह उल्लेखनीय है कि उन दिनों मैं बहुत ही धर्मभीरु था। देवी-देवताओं पर मेरी पूर्ण श्रद्धा थी तथा गीता-रामायण आदि ग्रन्थों में लिखी हुई बातों पर आँख मूँदकर विश्वास कर लेता था। मैं खासतौर से हनुमान जी का भक्त था तथा हनुमान चालीसा का पाठ प्रायः किया करता था और हर मंगलवार को प्रसाद भी बाँटा करता था। लेकिन अब जब मैं उन दिनों की क्रियाकलापों पर विचार करता हूँ, तो यह पाता हूँ कि उस सबसे मुझे अगर कोई हानि नहीं हुई, तो कोई लाभ भी नहीं हुआ। स्वामी दयानन्द और आर्य समाज की कृपा से मूर्तिपूजा को मैं ढोंग और मूर्खतापूर्ण मानता हूँ। देवी-देवताओं पर से मेरी श्रद्धा अब लगभग समाप्त हो गयी है। हालांकि गीता, रामायण आदि ग्रन्थों की अच्छी बातों पर मुझे आज भी गहरा विश्वास है और हनुमान जी के चरित्र और गुणों का मैं भारी प्रशंसक हूँ। सैकड़ों चैपाईयाँ, दोहे और श्लोक मुझे आज भी कण्ठस्थ हैं।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें