आत्मकथा भाग-1 अंश-12

कक्षा 5 से कक्षा 6 में दूसरे विद्यालय में आने के बाद भी पहले विद्यालय से मेरा नाता नहीं टूट सका था। वह वर्ष 1969 था, अतः अक्टूबर में गाँधी शताब्दी का उत्सव जिला स्तर पर पूरे देश में हो रहा था। हमारे मथुरा जिले का सम्मिलित उत्सव छाता नामक कस्बे में था। प्राइमरी स्कूल के प्रधानाध्यापक श्री लक्ष्मी नारायण शर्मा ने अछूतोद्धार पर एक नाटक तैयार किया था, जिसमें मुझे गाँधी जी की भूमिका दी गई थी। एक दिन हम अपने गाँव से चलकर बस द्वारा पहले अपने ब्लाक मुख्यालय बल्देव (दाऊजी) पहुँचे, फिर वहाँ से दूसरी बस से मथुरा होकर छाता पहुँचे थे। हमारा भोजन बनाने के लिए गाँव का एक आदमी भी हमारे साथ था। हमारे साथ जूनियर हाईस्कूल के दूसरे कुछ लड़के भी थे, जो एक लोकगीत प्रस्तुत करने जा रहे थे। उनमें मेरे बड़े भाई श्री गोविन्द स्वरूप और उन्हीं की कक्षा के श्री चन्द्रभान आदि थे।

नाटक की प्रस्तुति वाले दिन प्रधानाध्यापक जी ने मेरा सिर उस्तरे से बिल्कुल साफ करा दिया था तथा एक नजर का चश्मा भी मेरे लगा दिया था, जिससे मेरा हुलिया बिल्कुल महात्मा गाँधी जैसा हो गया था। नाटक काफी सफल रहा था और मेरा पार्ट खास तौर पर सराहा गया था, लेकिन कुछ कारणों से हमें कोई पुरस्कार नहीं मिल सका था। वैसे हमारे पूरे दल द्वारा प्रस्तुत अधिकतर कार्यक्रम पूर्णतया सफल रहे थे।

वहाँ से प्रस्थान करने के दिन हमें छाता से बल्देव पहुँचते-पहुँचते काफी रात हो गयी थी। मैं प्रायः जल्दी सो जाने का अभ्यस्त था, अतः मैं रास्ते भर प्रधानाध्यापक जी की गोद में सोता हुआ आया था। बल्देव आने के बाद भी वे मुझे कन्धे पर चिपकाकर बस से उतारकर बिस्तर तक ले गये थे। वे प्रायः कहा करते थे कि मुझे मेरे घर तक सुरक्षित पहुँचाने का दायित्व उनका है। उनके उस प्यार भरे व्यवहार को मैं आज भी नहीं भूल पाया हूँ और शायद कभी नहीं भूल सकूँगा।

गाँधी शताब्दी समारोह समाप्त हो जाने के बाद मैं अपनी पढ़ाई में लग गया था, हालांकि रात्रि में पढ़ने की आदत मुझे कभी नहीं रही। इतना अवश्य था कि अगर विद्यालय से कोई गृह कार्य मिलता था, तो उसे मैं घर पर समय निकालकर अवश्य कर लेता था। इससे अधिक पढ़ने की आवश्यकता मुझे नहीं मालूम पड़ती थी। कुछ तो इसलिए कि मैं अपनी कक्षा में सबसे आगे रहता था, अतः अपने होशियार होने का भी कुछ घमंड मुझ में था। दूसरा इसलिए कि घर पर पढ़ाई में मेरा मन नहीं लगता था और मैं जो बातें स्कूल में ही एक बार में समझ लेता था, उस पर घर पर समय बर्बाद करना मुझे उचित नहीं जान पड़ता था। इसका फल यह होता था कि रात्रि के समय जब दूसरे छात्र प्रायः पढ़ा करते थे, तो मैं सोया करता था या कोई फालतू किताब पढ़ रहा होता था।

परीक्षाओं के दिनों में भी जब दूसरे लोग किताबों को घोंटा करते थे और आने वाले प्रश्नों के बारे में अटकलें लगाया करते थे, मैं सोता रहता था और सोचता था कि परीक्षाओं के दिनों में तो दिमाग को अधिक आराम देना चाहिए। फिर भी इसे आश्चर्य ही कहा जायेगा कि मैं प्रायः प्रत्येक पर्चे में पूरी कक्षा में सबसे ज्यादा अंक लाया करता था, जबकि खूब मेहनत करने वाले छात्र औसत अंकों से ही उत्तीर्ण हो पाते थे।

मुझे अपनी सफलताओं का कुछ घमंड भी था और किसी से न दबना मेरा स्वभाव था और काफी हद तक अभी भी है। अतः प्रायः ही ऐसा होता था कि अपनी कक्षा के दूसरे लड़कों से, जो शारीरिक बल में मुझसे ज्यादा ताकतवर अवश्य थे, लेकिन पढ़ाई में मुझसे पीछे रहने के कारण प्रायः मुझसे ईष्र्या करते थे, मेरा झगड़ा बना रहता था। दबना मेरे स्वभाव में नहीं था, अतः बहुत बार मारपीट भी होती रहती थी। हालांकि कमजोर होने के कारण प्रायः मैं ही हार जाता था।

मेरी कक्षा का एक छात्र श्री धर्मवीर, जो पास के गाँव गोठा (हसनपुर) का निवासी था। काफी धनवान होने के कारण स्वयं को सबसे श्रेष्ठ मानता था प्रायः मुझसे बहुत ईष्र्या करता था, क्योंकि लाख कोशिश करने पर भी वह पढ़ाई में मुझसे आगे नहीं निकल पाता था और मुझे अध्यापकों से ज्यादा स्नेह मिलने के कारण वह हीनभावना से भी ग्रस्त रहता था। अतः अन्त समय तक ऐसा रहा कि हम दोनों में कभी सच्ची मित्रता स्थापित नहीं हो सकी। कुछ दूसरे लड़के अपने-अपने स्वार्थ के कारण भी हम दोनों को लड़ाने में बहुत रुचि लेते थे। आज जब यह सोचता हूँ तो मुझे बहुत दुःख होता है कि अपने झूठे दंभ में आकर मैंने इतना बहुमूल्य समय अपने सहपाठियों से लड़ने-झगड़ने में बिता दिया। लड़ाई-झगड़े की सैकड़ों घटनायें मुझे याद हैं, लेकिन उनमें से एक का जिक्र करना ही काफी रहेगा, जिससे कि आपको मेरे तत्कालीन व्यक्तित्व का कुछ आभास हो जाये।

मेरे गाँव का ही मेरा एक सहपाठी, जिसका नाम लिखना मैं यहाँ उचित नहीं समझता, जाति का जाट होने के कारण स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ मानता था, हालांकि पढ़ने-लिखने में उसकी स्थिति फिसड्डी से कुछ ही ऊपर थी। प्रारम्भ में हम दोनों में काफी मेल-जोल था तथा मैं पढ़ाई लिखाई में उसकी मदद कर दिया करता था और वह भी मेरा साथ दिया करता था। लेकिन एक दिन हम दोनों में कुछ कहा-सुनी हो गयी। बात हाथापाई तक पहुँची और ताकतवर होने के कारण वह मुझे पीटने लगा। मुझसे अब सहन नहीं हुआ और गुस्से में आकर मैंने वहाँ पड़ा हुआ ईंट का एक टुकड़ा उठाकर उसके सिर में दे मारा। गेंद फेंककर मारने का अभ्यास मुझे था ही, अतः मेरा निशाना चूका नहीं और ईंट ने उसके सिर में माथे से कुछ ऊपर एक बड़ा सा घाव कर दिया। ईंट मारकर मैं अपने घर भाग आया।

वह लड़का भी पीछे से रोता हुआ आया और गालियाँ बकने लगा। पिताजी और चाचाजी ने समझा- बुझाकर उसकी मरहम पट्टी कर दी, फिर किसी तरह लोगों ने उसे भगाया और मुझे भी बहुत डाँटा। मैंने बताया कि वह मुझे बिना किसी बात के ही मार रहा था, अतः मैंने भी गुस्से में आकर ईंट मार दी। लेकिन लोगों ने मुझसे कहा कि उसने तेरे साथ जो किया उसे कोई नहीं देखेगा, लेकिन तुमने जो घाव किया है उसे सभी देखेंगे। उस लड़के का बाप भी आकर धमकी दे गया कि मैं इससे दूना घाव तेरे सिर में कर दूँगा। उस लड़के ने भी धमकी दी कि कल जब तू पढ़ने जायेगा तब स्कूल में मारूंगा। मैं कुछ डरा हुआ था, फिर भी स्कूल पहुँच गया। वहाँ जाकर उसने गड़बड़ करने की कोशिश की, तो मैंने अध्यापकों तक बात पहुँचा दी। अध्यापकों ने उसे धमका दिया कि अगर स्कूल में या रास्ते में उसने मुझसे कुछ कहा, तो अच्छा नहीं होगा।

शीघ्र ही वह लड़का समझ गया कि अगर बात बढ़ाई गई तो परिणाम और भी ज्यादा खराब होगा। अतः कुछ बक-बकाकर वह चुप बैठ गया और फिर कभी उसने मुझे छेड़ने की हिम्मत नहीं की। यही नहीं दूसरे लड़के भी अब मुझसे डरने लगे थे, क्योंकि वे समझ गये थे कि यह लड़का टूट सकता है, मगर झुक नहीं सकता। इसी तरह के खट्टी-मीठी घटनाओं के बीच मेरी शिक्षा चलती रही।

-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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