आत्मकथा भाग-1 अंश-10
आज इतने वर्षो बाद भी मुझे अपने तत्कालीन शिक्षकों की अच्छी तरह याद है। उस समय हमारे प्रधानाध्यापक थे श्री रतीराम शर्मा, जिन्हें हम प्रायः बाबा कहा करते थे। वे काफी बूढ़े थे और जिस साल मैंने कक्षा छः में दाखिला लिया था उसी साल के बाद वे अवकाश प्राप्त करने वाले थे। वे छात्रों, अध्यापकों तथा आसपास के गाँवों में बहुत लोकप्रिय थे और इसी लोकप्रियता के कारण उनकी सेवा अवधि एक वर्ष के लिए बढ़ा दी गयी थी अर्थात् वे तब रिटायर हुए जब मैं कक्षा सात पास कर चुका था।
वे हमारे गाँव से करीब चार कोस दूर एक गाँव ‘कारब’ के निवासी थे। हालांकि वे काफी बूढ़े और कमजोर थे, आँखों से कम दिखाई देता था तथा कानों से भी ऊँचा सुनते थे, लेकिन रोज साइकिल पर आया-जाया करते थे। वे निश्चित समय से पहले ही विद्यालय में पहुँच जाते थे, जब तक कि कोई अन्य अध्यापक नहीं आ पाता था और सबके बाद जाया करते थे। अपनी याद में मैंने उन्हें कभी देरी से आते हुए नहीं देखा। वे गणित और सामाजिक विषयों के विद्वान थे तथा इन विषयों के अन्य अधिकारी अध्यापक उनसे मदद लिया करते थे। गणित मेरा प्रिय विषय रहा है और मैं गणित में सदा आगे रहा हूँ। अतः स्वभावतः ही वे मुझे बहुत प्यार करते थे। वे प्रायः कहा करते थे कि तुम ही मेरे बेटे हो।
उन्होंने एक बार मेरे आत्म विश्वास की बड़ी कड़ी परीक्षा ली थी। उस समय मैं कक्षा 6 में था। एक दिन उन्होंने एक सवाल पूछा। पूरी कक्षा में मेरे सिवा कोई भी उसका उत्तर नहीं दे पाया। सवाल तो अब मुझे याद नहीं, लेकिन उसका उत्तर ‘30’ था। जब मैंने उत्तर बताया ‘30’, तो बाबा ने गुस्से में मेरी तरफ देखा और बुलाया। फिर उन्होंने मेरा हाथ उल्टा पकड़ लिया और हाथ में डस्टर उठा लिया (मारने के लिए) और कहा- ‘गलत जबाब देता है। बता कितना होगा?’ मैंने कहा- ‘साब, 30 ही होगा।’ वे बोले- ‘सही सही बता, नहीं मारता हूँ।’ कहते हुए उन्होंने सचमुच ही डस्टर मेरी उँगलियों में मारना चाहा। मैं भौंचक था, फिर भी मैंने कहा- ‘साहब, इसका जबाब तो 30 ही होगा।’ मेरी दृढ़ता और आत्मविश्वास देखकर उन्होंने डस्टर फेंक दिया और मुझे अपनी छाती से चिपका लिया और कहते रहे- ‘अरे मेरे बेटा! तुही मेरौ बेटा ऐ।’
उनका वह अपनत्व भरा आलिंगन आज भी मेरा मन गद्गद कर देता है। उसके बाद उन्होंने अपना गणित का अधिक से अधिक ज्ञान मुझे दे डाला। जब कभी वे कक्षा 8 को पढ़ा रहे होते थे और हमारी कक्षा के लड़के वहाँ पहुँच जाते थे, तो वे मुझे छोड़कर बाकी सबको भगा देते थे और मुझसे कहते थे कि तू यह सीख ले। यह सब तेरे काम आयेगा। इसका परिणाम यह हुआ कि कक्षा 6 में ही मैं कक्षा 8 के गणित के बहुत से प्रश्न हल करने लगा था। उन्होंने गणित के कुछ सवालों को हल करने के पुराने सूत्र भी मुझे बताये थे जो कि दोहे के रूप में थे। एक तरह का सवाल होता है कि एक आदमी ने 10 रुपये के 12 केले के हिसाब से कुछ केले खरीदे और 12 रुपये के 10 केले के हिसाब से बेचे तो उसे कितने प्रतिशत लाभ हुआ। इसका सूत्र है-
लघु-लघु बड़-बड़ कौ गुणा अन्तर लेहु निकारि।
लघू राशि पै लाभ गुनि प्रतिशत लेहु निकारि।।
कभी कभी बाबा हमें हिन्दी अपठित भी पढ़ाया करते थे, जिसके अन्तर्गत वे बहुत पुराने (हमारे लिए अज्ञात) पद्यावतरण और उनके अर्थ बताया करते थे। उस समय बाबा से सीखे हुए कई पद्य मुझे आज तक याद हैं, जिन्हें मैं नीचे लिख रहा हूँ-
हैं री तेरे लाल ऐहों ऐसी निधि पाई कहाँ,
हैं री खगजान खग मैंने नहीं पारे हैं
हैं री गिरधारी कहूँ राम दल माँझ देख,
हैं री वनवारी कहूँ शीत सर सारे हैं
हैं री कृष्णचन्द्र आली चन्द्र कहूँ कृष्ण होत,
तब हँसि राधे कही मोर पक्ष वारे हैं
‘केशव’ दुराय जसुमति हँसि बोली यों
तिहारे पक्षवारे सो हमारे क्यों सिधारे हैं?
खोलो जू किवार, तुम को हौ ऐती बार,
हरि नाम है हमार, जाऔ कानन पहार में
हूँ तो प्यारी माधव, तौ कोकिला के माथे भाग,
मोहन हूँ प्यारी, परौ मंत्रव्यभिचार में
जोगी हूँ रसीली, तौ जाऔ काहू दाता पास,
भोगी हूँ प्यारी, तो बसौ जू पताल में
......................................
हूँ तौ घनश्याम, बरसौ जू काहू खार में।
वाघन पै गये देखि बन में रहे छिपि, साँपन पै गये तौ पताल ठौर पाई है
गजन पै गए धूरि डारत हैं शीश पर, वैद्यनपै गये दवा काऊ ना बताई है
तब हैराय हम हरि के निकट गये, हरि मोसे कहैं तेरी मति बौराई है
कोऊ न उपाय भटकत जनि डोलै क्यों, खाट के मगर खटमल्ल की दुहाई है।
तू रहि री हौं ही लखौं चढ़नि अटा शशि बाल।
बिन ही ऊगे शशि समुझि दैहें अरघ अकाल।।
वे स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं के विशेषज्ञ थे तथा 15 अगस्त, 26 जनवरी आदि राष्ट्रीय पर्वों पर काफी दिलचस्प बातें बताया करते थे। एक बार मैंने जिज्ञासा से पूछा था- क्या आपने गाँधी, नेहरू, पटेल वगैरह नेता देखे थे? तो वे बोले थे- ‘हमने सबु देखेऽऽ’। वे मुझे इतना प्यार करते थे कि मेरी बड़ी से बड़ी गलतियाँ भी मामूली सजा देकर माफ कर देते थे। मेरा दुर्भाग्य कि उनके अवकाश ग्रहण के बाद मैं उनके दर्शन न कर सका। रिटायर होने के दो वर्ष के अन्दर ही उनका देहान्त हो गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
वे हमारे गाँव से करीब चार कोस दूर एक गाँव ‘कारब’ के निवासी थे। हालांकि वे काफी बूढ़े और कमजोर थे, आँखों से कम दिखाई देता था तथा कानों से भी ऊँचा सुनते थे, लेकिन रोज साइकिल पर आया-जाया करते थे। वे निश्चित समय से पहले ही विद्यालय में पहुँच जाते थे, जब तक कि कोई अन्य अध्यापक नहीं आ पाता था और सबके बाद जाया करते थे। अपनी याद में मैंने उन्हें कभी देरी से आते हुए नहीं देखा। वे गणित और सामाजिक विषयों के विद्वान थे तथा इन विषयों के अन्य अधिकारी अध्यापक उनसे मदद लिया करते थे। गणित मेरा प्रिय विषय रहा है और मैं गणित में सदा आगे रहा हूँ। अतः स्वभावतः ही वे मुझे बहुत प्यार करते थे। वे प्रायः कहा करते थे कि तुम ही मेरे बेटे हो।
उन्होंने एक बार मेरे आत्म विश्वास की बड़ी कड़ी परीक्षा ली थी। उस समय मैं कक्षा 6 में था। एक दिन उन्होंने एक सवाल पूछा। पूरी कक्षा में मेरे सिवा कोई भी उसका उत्तर नहीं दे पाया। सवाल तो अब मुझे याद नहीं, लेकिन उसका उत्तर ‘30’ था। जब मैंने उत्तर बताया ‘30’, तो बाबा ने गुस्से में मेरी तरफ देखा और बुलाया। फिर उन्होंने मेरा हाथ उल्टा पकड़ लिया और हाथ में डस्टर उठा लिया (मारने के लिए) और कहा- ‘गलत जबाब देता है। बता कितना होगा?’ मैंने कहा- ‘साब, 30 ही होगा।’ वे बोले- ‘सही सही बता, नहीं मारता हूँ।’ कहते हुए उन्होंने सचमुच ही डस्टर मेरी उँगलियों में मारना चाहा। मैं भौंचक था, फिर भी मैंने कहा- ‘साहब, इसका जबाब तो 30 ही होगा।’ मेरी दृढ़ता और आत्मविश्वास देखकर उन्होंने डस्टर फेंक दिया और मुझे अपनी छाती से चिपका लिया और कहते रहे- ‘अरे मेरे बेटा! तुही मेरौ बेटा ऐ।’
उनका वह अपनत्व भरा आलिंगन आज भी मेरा मन गद्गद कर देता है। उसके बाद उन्होंने अपना गणित का अधिक से अधिक ज्ञान मुझे दे डाला। जब कभी वे कक्षा 8 को पढ़ा रहे होते थे और हमारी कक्षा के लड़के वहाँ पहुँच जाते थे, तो वे मुझे छोड़कर बाकी सबको भगा देते थे और मुझसे कहते थे कि तू यह सीख ले। यह सब तेरे काम आयेगा। इसका परिणाम यह हुआ कि कक्षा 6 में ही मैं कक्षा 8 के गणित के बहुत से प्रश्न हल करने लगा था। उन्होंने गणित के कुछ सवालों को हल करने के पुराने सूत्र भी मुझे बताये थे जो कि दोहे के रूप में थे। एक तरह का सवाल होता है कि एक आदमी ने 10 रुपये के 12 केले के हिसाब से कुछ केले खरीदे और 12 रुपये के 10 केले के हिसाब से बेचे तो उसे कितने प्रतिशत लाभ हुआ। इसका सूत्र है-
लघु-लघु बड़-बड़ कौ गुणा अन्तर लेहु निकारि।
लघू राशि पै लाभ गुनि प्रतिशत लेहु निकारि।।
कभी कभी बाबा हमें हिन्दी अपठित भी पढ़ाया करते थे, जिसके अन्तर्गत वे बहुत पुराने (हमारे लिए अज्ञात) पद्यावतरण और उनके अर्थ बताया करते थे। उस समय बाबा से सीखे हुए कई पद्य मुझे आज तक याद हैं, जिन्हें मैं नीचे लिख रहा हूँ-
हैं री तेरे लाल ऐहों ऐसी निधि पाई कहाँ,
हैं री खगजान खग मैंने नहीं पारे हैं
हैं री गिरधारी कहूँ राम दल माँझ देख,
हैं री वनवारी कहूँ शीत सर सारे हैं
हैं री कृष्णचन्द्र आली चन्द्र कहूँ कृष्ण होत,
तब हँसि राधे कही मोर पक्ष वारे हैं
‘केशव’ दुराय जसुमति हँसि बोली यों
तिहारे पक्षवारे सो हमारे क्यों सिधारे हैं?
खोलो जू किवार, तुम को हौ ऐती बार,
हरि नाम है हमार, जाऔ कानन पहार में
हूँ तो प्यारी माधव, तौ कोकिला के माथे भाग,
मोहन हूँ प्यारी, परौ मंत्रव्यभिचार में
जोगी हूँ रसीली, तौ जाऔ काहू दाता पास,
भोगी हूँ प्यारी, तो बसौ जू पताल में
......................................
हूँ तौ घनश्याम, बरसौ जू काहू खार में।
वाघन पै गये देखि बन में रहे छिपि, साँपन पै गये तौ पताल ठौर पाई है
गजन पै गए धूरि डारत हैं शीश पर, वैद्यनपै गये दवा काऊ ना बताई है
तब हैराय हम हरि के निकट गये, हरि मोसे कहैं तेरी मति बौराई है
कोऊ न उपाय भटकत जनि डोलै क्यों, खाट के मगर खटमल्ल की दुहाई है।
तू रहि री हौं ही लखौं चढ़नि अटा शशि बाल।
बिन ही ऊगे शशि समुझि दैहें अरघ अकाल।।
वे स्वतंत्रता संग्राम की घटनाओं के विशेषज्ञ थे तथा 15 अगस्त, 26 जनवरी आदि राष्ट्रीय पर्वों पर काफी दिलचस्प बातें बताया करते थे। एक बार मैंने जिज्ञासा से पूछा था- क्या आपने गाँधी, नेहरू, पटेल वगैरह नेता देखे थे? तो वे बोले थे- ‘हमने सबु देखेऽऽ’। वे मुझे इतना प्यार करते थे कि मेरी बड़ी से बड़ी गलतियाँ भी मामूली सजा देकर माफ कर देते थे। मेरा दुर्भाग्य कि उनके अवकाश ग्रहण के बाद मैं उनके दर्शन न कर सका। रिटायर होने के दो वर्ष के अन्दर ही उनका देहान्त हो गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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