आत्मकथा भाग-2 अंश-10
एक बार हम सब अधिकारियों ने लखनऊ के ऐतिहासिक दिलकुशा बाग में पिकनिक भी मनायी थी। तब तक कई अधिकारियों का विवाह हो चुका था। सब अपने पूरे परिवार के साथ उसमें शामिल हुए थे। उस पिकनिक में सभी अधिकारियों के टाइटिल बनाने का काम मुझे सौंपा गया था। मैंने सबके मजेदार टाइटिल बनाए थे और पिकनिक में सुनाए थे। सबने उनकी खूब प्रशंसा की थी। उसके बाद खाना-पीना हुआ। सब लोगों को अलग-अलग चीजें बनाकर लाने के लिए कहा गया था। मैं कुछ बना नहीं सकता था, इसलिए केवल अचार ले गया था। खाने के बाद खेल-कूद का कार्यक्रम था। मैंने एक दिमागी प्रज्ञा युद्ध (Intelligence War) का खेल बनाया था। इसमें एक पर्ची को छिपाया जाता है और उसको खोजने के संकेत दूसरी पर्ची पर लिखे जाते हैं, उसको खोजने के संकेत तीसरी पर्ची पर, इस तरह कुल 5 पर्चियाँ ढूँढ़नी होती हैं। खिलाड़ियों के दो समूह बनाये जाते हैं और उन्हें अलग-अलग एक-एक पर्ची दी जाती है। फिर उनसे कहा जाता है कि अपनी-अपनी पर्चियाँ खोजते हुए अन्तिम पर्ची तक पहुँचना है। अन्तिम पर्ची दोनों समूहों की समान होती है। जो समूह पहले उस पर्ची तक पहुँच जाता है, वह जीत जाता है। पर्चियों में स...