आत्मकथा भाग-3 अंश-6
कम्प्यूटर सेंटर का हाल
कानपुर में हमारा कम्प्यूटर सेंटर सुचारु रूप से चल रहा था। श्री श्रवण कुमार श्रीवास्तव पहले ही भोपाल भेजे जा चुके थे। लखनऊ से आने वाले दो अधिकारियों- श्री अनिल मिश्र और श्री अब्दुल रब खाँ- का स्थानांतरण वहाँ से दूर क्रमशः मेरठ और पटना किया जा चुका था। इनके बदले में मेरे वाराणसी के सहयोगी श्री अतुल भारती की नियुक्ति कानपुर में हमारे ही कम्प्यूटर सेंटर पर हो गयी। श्री शैलेश कुमार अभी भी वहीं थे। इनके अतिरिक्त श्रीमती रेणु सक्सेना इलाहाबाद से स्थानांतरित होकर वहाँ आयीं परन्तु एक दिन बाद ही उनको कानपुर मुख्य शाखा में लगा दिया गया। इस तरह मेरे कम्प्यूटर केन्द्र पर मुझे मिलाकर कुल चार अधिकारी, दो कम्प्यूटर ऑपरेटर और एक क्लर्क थे। हमारे कार्य की मात्रा के अनुसार इतने लोग पर्याप्त थे, परन्तु तब तक कोई चपरासी नहीं था। इससे पानी वगैरह स्वयं लाकर पीना पड़ता था।
शीघ्र ही एक चपरासी श्रीमती कृष्णा देवी की नियुक्ति हमारे कम्प्यूटर सेंटर पर कर दी गयी। उनके पति हमारे बैंक में सिक्योरिटी गार्ड थे, जिनका आकस्मिक देहान्त हो जाने के कारण उनकी पत्नी को अनुकम्पा के आधार पर नौकरी दी गयी थी, हालांकि वे नितांत अनपढ़ थीं। कृष्णा देवी के आने से हमें काफी आराम हो गया। चाय-पानी के साथ ही मंडलीय कार्यालय पत्र आदि ले जाने तथा अन्य छोटे-मोटे कार्य भी उनसे कराये जाते थे।
कृष्णा देवी के अनपढ़ होने के कारण हमें उनसे काम लेने में कभी-कभी बहुत कठिनाई होती थी। इसलिए मैंने सोचा कि उन्हें कम से कम हिन्दी तो सिखा ही सकता हूँ। अतः मैंने रोज घंटा-आधा घंटा उनको पढ़ाना शुरू किया। ककहरा तो वे कुछ जानती थीं, बाकी सीख गयीं। फिर मैंने उन्हें मात्राओं का ज्ञान कराना शुरू किया। परन्तु उनका दिमाग इतना कमजोर था कि पूरे 2 महीने तक बहुत प्रयत्नों के बाद भी वे ‘क’ और ‘का’ का अन्तर नहीं समझ पायीं। मजबूर होकर मुझे उनको पढ़ाना बन्द कर देना पड़ा।
पहली समस्या
ऊपर मैं लिख चुका हूँ कि मेरे आने से पहले कम्प्यूटर सेंटर में अधिक काम नहीं होता था। 5-5 अधिकारियों के होते हुए भी बहुत कम काम वहाँ होता था और बड़े-बड़े काम बाहर ही प्राइवेट कम्पनियों से कराये जाते थे। मुख्य रूप से एडवांसशीट का डाटा तैयार करने तथा सुधार करने का काम बाहर होता था। सेंटर पर केवल उनको छापा जाता था। एडवांसशीट भी नियमित नहीं सुधारी जाती थी, बस किसी तरह खानापूरी कर दी जाती थी। लेकिन हमारे आने के बाद पता नहीं क्यों पहली बार मंडलीय कार्यालय ने यह स्पष्ट आदेश निकाल दिया कि सारी एडवांसशीटों का डाटा यहीं तैयार किया जाएगा अर्थात् बाहर से कोई काम नहीं कराया जाएगा।
एडवांसशीट में बैंक की शाखाओं द्वारा जो ऋण बाँटे जाते हैं उनका पूरा विवरण लिखा जाता है और उसे हर तीन महीने बाद सुधारा जाता है, ताकि पता चल जाये कि ऋण की वसूली की क्या स्थिति है। प्रत्येक शाखा में हजारों ऐसे खाते होते हैं। अभी तक यह कार्य लापरवाही से किया जा रहा था, परन्तु उस समय सभी बैंकों को अपने खराब ऋण घटाने पर अधिक जोर देने का आदेश दिया गया था। शायद इसी कारण हमारे मंडलीय कार्यालय द्वारा तत्काल सारी एडवांसशीट तुरन्त तैयार करने का आदेश दे दिया गया। उस पर तुर्रा यह कि सारा कार्य वहीं करना होगा, बाहर से कुछ नहीं कराया जाएगा।
उत्तरप्रदेश में बिजली की हालत सदा से खराब रही है और उस समय तो हालत और भी ज्यादा खराब थी, क्योंकि मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। इसलिए अगर हम सभी अधिकारी और कर्मचारी लगातार रोज लगे रहते, तो भी वह कार्य दो-तीन माह से पहले समाप्त होना असम्भव था। इसलिए हमने अपने सहायक महा प्रबंधक महोदय से निवेदन किया कि कुछ कार्य हम यहाँ कर लेंगे और कुछ कार्य बाहर करा लिया जाये, ताकि काम समय पर समाप्त हो जाये। इसके साथ ही हमने निवेदन किया कि कम्प्यूटर चलाने के लिए जनरेटर किराये पर ले लिया जाये, ताकि बिजली के कारण काम न रुके।
जनरेटर किराये पर लेने के लिए वे सिद्धान्त रूप में तैयार हो गये, लेकिन मंडलीय कार्यालय में उस समय मुख्य प्रबंधक के रूप में श्री एस.के. घोष पदस्थ थे (मेरे बगल के फ्लैट में रहने वाले मुख्य प्रबंधक श्री पी.के. कपूर पहले ही प्रधान कार्यालय स्थानांतरित हो चुके थे।) पता नहीं क्यों, घोष बाबू जनरेटर किराये पर लेने का आदेश निकालने में टालमटोल कर रहे थे और बार-बार अड़ंगा लगा रहे थे। एक दिन मैं इस मामले पर बात करने के लिए घर से सीधा मंडलीय कार्यालय गया। वहाँ घोष बाबू फिर टालमटोल कर रहे थे और ‘यह कागज लगाओ-वह कागज लगाओ’ करके मामले को लटका रहे थे।
उसी दिन संयोग से हमारे सहायक महाप्रबंधक महोदय श्री पांडेय हमारे कम्प्यूटर सेंटर को देखने प्रातः 10 बजे से पहले ही पहुँच गये। मैं उस समय मंडलीय कार्यालय में था और मुझे पता ही नहीं था कि पांडेय जी कहाँ गये हैं। जब उन्होंने अधिकांश अधिकारियों को अनुपस्थित देखा तो बहुत नाराज हुए और हाजिरी रजिस्टर में सबकी अनुपस्थिति लगा दी। फिर सबको धमकी दे गये कि यदि अगस्त तक (यानी दो महीने में) एडवांसशीट का काम पूरा नहीं हुआ तो सबको सस्पेंड कर दूँगा। इससे सारे अधिकारी डर गये। जब दोपहर को मैं वहाँ पहुँचा, तो मुझे सारी बात मालूम पड़ी।
तब मैंने यह उचित समझा कि सारे मामले को स्पष्ट करते हुए एक पत्र पांडेय जी को लिखा जाये और उनसे निवेदन किया जाये कि जल्दी जनरेटर की अनुमति दे दें और कुछ कार्य बाहर कराने की भी अनुमति दे दें। उस पत्र में मैंने यह भी लिख दिया कि ऐसे मामलों में वरिष्ठ अधिकारियों के सहयोग की आशा की जाती है। मेरा संकेत तो घोष बाबू के असहयोग की ओर था, लेकिन इसको पढ़कर पांडेय जी ने शायद यह समझा कि मैं स्वयं उन पर असहयोग करने का आरोप लगा रहा हूँ। इससे वे बहुत नाराज हुए। उन्होंने दो दिन बाद ही मुझे मंडलीय कार्यालय बुला भेजा।
जब मैं उनके कमरे में घुसा तो मेरा पत्र उनके सामने मेज पर खुला रखा था। मुझे देखते ही उन्होंने नमस्ते के जबाव में अंग्रेजी में लिखकर कहा- ”क्या मैं तुम्हें आज ही सस्पेंड कर दूँ?“ यह सुनकर एक बार तो मैं सकते में आ गया, फिर मैंने शान्ति से अंग्रेजी में ही उत्तर दिया- ”सर, सस्पेंशन कोई समाधान नहीं है। यदि मुझे सस्पेंड करने से कोई समस्या हल हो सकती है, तो मैं खुशी से सस्पेंड होने को तैयार हूँ।“ मेरे इस जबाव से वे एकदम शान्त हो गये।
फिर मैंने उन्हें एडवांसशीट की समस्या समझायी। मैंने उन्हें बताया कि पिछले तीन-चार साल से एडवांसशीट लगभग सारी हाथ से ही लिखी जा रही है, बहुत कम डाटा कम्प्यूटर पर है और जो डाटा कम्प्यूटर पर है वह भी बहुत पुराना और अधूरा है। रिकार्डों की संख्या ज्यादा है, इसलिए इसमें बहुत समय लगने की सम्भावना है। इसके अलावा बिजली की बहुत समस्या है और अभी तक जनरेटर की अनुमति नहीं मिली है।
तब उन्होंने मुख्य प्रबंधक श्री एस.के. घोष को बुलाया और पूछा कि ‘जनरेटर की अनुमति क्यों नहीं दी है?’, तो वे बगलें झाँकने लगे और कहने लगे कि अनुमति दे दी है। मैंने पूछा- ”कहाँ है अनुमति?“, तो वे कोई जबाव नहीं दे सके। तब पांडेय जी ने मुझसे कहा कि जनरेटर लगवा लो, अनुमति की औपचारिकता बाद में होती रहेगी। इस पर मैंने उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद दिया और कहा कि हम आज ही जनरेटर लगवा लेंगे और कल से काम पूरे जोर-शोर से करना शुरू कर देंगे।
जब मैं इस सफलता के बाद अपने कम्प्यूटर सेंटर पहुँचा और अपने साथी अधिकारियों को सारी बातचीत बतायी, तो वे बहुत खुश हुए और आश्चर्य व्यक्त किया कि मैंने अपनी हिम्मत और बुद्धिमानी से वह विकट मामला सरलता से हल कर दिया। वे पूछने लगे कि आपमें इतनी हिम्मत आयी कहाँ से? मेरा कहना था कि ऐसी हिम्मत पैदा करने के लिए 25 साल तक रोज खाकी नेकर पहनकर शाखा जाना पड़ता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इसके बाद हम सब एकदम तनावमुक्त हो गये और कार्य भी भली प्रकार चलने लगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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