आत्मकथा भाग-3 अंश-3
कार्यालय में
अगले ही दिन मैं अपने कार्यालय अर्थात् कम्प्यूटर सेंटर पहुँच गया। उस समय हमारे कम्प्यूटर सेंटर की हालत बहुत विचित्र थी। पहले दिन मैंने काम की जानकारी ली तो पता चला कि कोई भी काम पड़ा हुआ अर्थात् बकाया नहीं है। शीघ्र ही इसका रहस्य मुझे ज्ञात हो गया। वास्तव में वहाँ ज्यादा काम होता ही नहीं था। मंडल की 128 शाखाओं में से केवल 35-40 शाखाओं का वेतन वहाँ बनता था, जो श्री अब्दुल रब खाँ बना दिया करते थे। पेंशन जरूर सबकी बन जाती थी, जो श्री शैलेश कुमार बनाया करते थे। यह कार्य भी महीने में केवल तीन दिन का होता था। वीकली का अकेला काम श्री के.सी. श्रीवास्तव कर देते थे। एडवांस शीट का कार्य बाहर कराते थे। इसके अलावा कुछ छुटपुट काम श्री अनिल मिश्र कर देते थे। इन कामों के अलावा वे कोई नया काम अपने हाथ में लेना ही नहीं चाहते थे। श्रवण कुमार जी स्वयं कुछ नहीं करते थे, केवल काम अधिकारियों में बाँटते थे।
इतने पर भी कम्प्यूटर सेंटर के बारे में मंडलीय कार्यालय की धारणा बहुत अच्छी थी। इसका रहस्य यह था कि कम्प्यूटर सेंटर के पास ही कर्मचारियों की सोसाइटी का ऑफिस था। वहाँ नेता लोग बैठते थे। उस ऑफिस में उस समय न तो कूलर था और न कोई टेलीफोन, जबकि कम्प्यूटर सेंटर में टेलीफोन के साथ एयरकंडीशनर भी था। इसलिए नेता लोग प्रायः कम्प्यूटर सेंटर में ही बैठकर अपनी गतिविधियाँ चलाया करते थे। वे ही लोग मंडलीय कार्यालय में जाकर कह देते थे कि कम्प्यूटर सेंटर में बहुत काम होता है और अच्छी तरह चल रहा है।
जब वहाँ मेरी पोस्टिंग हो गयी, तो वे लोग समझ गये कि अब श्री श्रवण कुमार श्रीवास्तव को वहाँ से कहीं और भेज दिया जायेगा और वहाँ उनकी अड्डेबाजी नहीं चल पायेगी। इसलिए कुछ नेता टाइप लोग प्रारम्भ से ही मुझसे विरोध मानने लगे, परन्तु मैंने इसकी चिन्ता नहीं की। लगभग दो महीने बाद ही श्री श्रवण कुमार श्रीवास्तव का स्थानांतरण भोपाल कर दिया गया। फिर मैंने अपनी स्टाइल के अनुसार कम्प्यूटर केन्द्र के कार्य को व्यवस्थित करना शुरू किया।
कानपुर शहर
यहाँ कानपुर शहर के बारे में बता देना अच्छा रहेगा। यह शहर उत्तर प्रदेश का सबसे अधिक जनसंख्या वाला नगर है। यह आबादी की दृष्टि से तो महानगर है, परन्तु मानसिकता की दृष्टि से कस्बा कहना ज्यादा सही होगा। यह अधिक पुराना शहर नहीं है। कुछ सौ वर्ष पहले यहाँ उजाड़ सी जगह थी। यह स्थान लखनऊ से झाँसी और इलाहाबाद से दिल्ली के मार्ग पर सीधा पड़ता है अर्थात् दोनों प्रमुख मार्ग यहाँ मिलते हैं। यह गंगाजी के किनारे भी है, इसलिए यह दोनों मार्गों पर आने-जाने वालों का स्थायी ठहराव बन गया था। लगभग 400 वर्ष पहले किसी राजा ने यहाँ एक गाँव बसा दिया था, जिसका नाम कान्हापुर रखा गया था। बोलचाल में इसे लोग ‘कानापुर’ कहते थे, जो अशोभनीय लगता था। इसलिए कालान्तर में इसका नाम ‘कानपुर’ प्रचलित हो गया। तभी से यह नाम चलता आ रहा है। हालांकि भूरे और काले अंग्रेजों ने रोमन लिपि में इसका नाम कम से कम 17 प्रकार से लिखा था। पर अब केवल ‘Kanpur’ लिखा जाता है।
अंग्रेजों ने यहाँ अपनी सुविधा की दृष्टि से एक छावनी बना रखी थी। इसका कारण था कि यह शहर लखनऊ, इलाहाबाद और झाँसी इन तीनों शहरों से पर्याप्त दूर होने के कारण विद्रोहों से सुरक्षित था और पर्याप्त निकट भी पड़ने के कारण आवश्यकता के समय यहाँ से किधर को भी सेना भेजी जा सकती थी। सुरक्षित होने के कारण यहाँ कारखाने खड़े किये गये, जिनमें मुख्यतः सूती कारखाने, जूट मिल और खाद के कारखाने थे। इससे धीरे-धीरे यह शहर एक प्रमुख औद्योगिक नगर और थोक का मार्केट बन गया। एक समय इसे ‘पूरब का मानचेस्टर’ कहा जाता था।
वैसे अभी भी यह उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा व्यापारिक केन्द्र है, हालांकि मजदूर यूनियनों के नेताओं की कृपा से लगभग सभी कारखानों की हालत बहुत खराब हो गयी है। किसी समय यहाँ के कारखानों में काम करने वाले मजदूर बहुत खुशहाल थे, अच्छा कमाते, खाते और पहनते थे। परन्तु मजदूर नेताओं ने हड़ताल करवा-करवाके सभी कारखानों का सत्यानाश कर दिया और अब अधिकांश कारखाने बन्द पड़े हैं। इसके कारण उनमें काम करने वाले मजदूर भूखों मर रहे हैं अथवा कोई अन्य कार्य करने को मजबूर हैं।
बड़े-बड़े कारखाने बन्द रहने के कारण कानपुर में दरिद्र नारायणों की बड़ी संख्या है और शायद इसी कारण यह देश का सबसे सस्ता महानगर है। यहाँ फल, सब्जी, कपड़े तथा मजदूरी यहाँ तक कि रिक्शे-टेंपो भी अन्य शहरों के मुकाबले बहुत सस्ते हैं। यहाँ की सड़कें उत्तरप्रदेश की सबसे खराब सड़कों में गिनी जा सकती हैं और गन्दगी में यह आगरे का बाप ही होगा। यहाँ पूरे शहर में सूअरों की अच्छी-खासी संख्या है, जो शहर भर की सड़कों पर मटरगश्ती करते फिरते हैं और गन्दगी फैलाते हैं। इन सूअरों के गर्भाधान-पुंसवन से लेकर अंत्येष्टि तक पूरे सोलह संस्कार सड़कों पर ही सम्पन्न होते हैं। शहर में सूअर-माफिया का साम्राज्य है। उनके ऊपर उँगली उठाने वाले की जान तक को खतरा रहता है, इसलिए कोई भी राजनैतिक दल उनसे पंगा नहीं लेता।
लेकिन कानपुर में कई अच्छी बातें भी हैं। यहाँ धार्मिकता और सामाजिकता का बहुत बोलवाला है। कई धार्मिक-सामाजिक संगठन हैं, जो अनेक कार्यक्रम करते रहते हैं। इतने कार्यक्रम शायद ही किसी शहर में होते हों। कई अच्छे पुस्तकालय हैं और पढ़ाई-लिखाई पर बहुत जोर है। यहाँ के विद्यालयों के बच्चे उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाओं में छाये रहते हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि तमाम गन्दगी और प्रदूषण के बाद भी लोग अपने स्वास्थ्य के प्रति बहुत जागरूक हैं। यहाँ प्रातः भ्रमण करने वालों की अच्छी-खासी संख्या है। मोतीझील, जापानी गार्डन, फूलबाग, जे.के. मंदिर आदि कई अच्छे बाग हैं, जहाँ भारी संख्या में लोग घूमने आते हैं। यहाँ भिगोये हुए और अंकुरित चने, मूँग आदि अन्न बहुत खाये जाते हैं तथा मठा (छाछ) भी बहुत पिया जाता है। यहाँ जगह-जगह पर अंकुरित अन्न और मठा बेचने वाले बैठते हैं। हमारे शहर आगरे में तो इन चीजों को खोजना भी कठिन है।
मुझे लगता है कि कानपुर में स्वास्थ्य के प्रति यह जागरूकता स्वामी देवमूर्ति जी महाराज की देन है, जिन्होंने मोतीझील से प्राकृतिक चिकित्सा तथा योग का प्रचार प्रारम्भ किया था। उनके बारे में मैं अपनी आत्मकथा के पहले भाग में लिख चुका हूँ। अब उनके शिष्य डा. ओम प्रकाश आनन्द इस कार्य को जारी रखे हुए हैं। हालांकि वर्तमान में वे भटक गये हैं और स्वमूत्र चिकित्सा, एक्यूप्रेशर, एक्यूपंक्चर, चुम्बक चिकित्सा आदि से होते हुए रेकी तक पहुँच गये हैं। वे रेकी को भी प्राकृतिक चिकित्सा का अंग बताते हैं, क्योंकि उसमें कोई दवा नहीं खायी जाती। इस हिसाब से तो झाड़फूँक चिकित्सा को भी प्राकृतिक चिकित्सा का अंग मानना होगा, क्योंकि उसमें भी कोई दवा नहीं ली जाती। रेकी वास्तव में जापानी या कोरियाई झाड़फूँक चिकित्सा ही है।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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