आत्मकथा भाग-3 अंश-13
पुस्तकों का प्रकाशन
अपनी आत्मकथा के पिछले भाग में मैं बता चुका हूँ कि आगरा के उपकार प्रकाशन ने अपनी पहली पुस्तक की सफलता से उत्साहित होकर मुझे पीसी पर चलने वाले प्रोग्रामों पर पुस्तक लिखने का आदेश दिया था। यह वही पुस्तक थी जो मैं बीपीबी पब्लिकेशन के लिए लिख रहा था, लेकिन बाद में वे पीछे हट गये थे। सौभाग्य से वह अधूरी पांडुलिपि उपकार प्रकाशन को अच्छी लगी और उसे छापने को तैयार हो गये। पांडुलिपि की जाँच हमारे ही बैंक के एक कम्प्यूटर अधिकारी श्री उत्तम कुमार मौर्य ने की थी और उनके बताये अनेक उपयोगी सुधारों के बाद वह पांडुलिपि प्रकाशनार्थ गयी। जब तक वह छपकर आयी, तब तक मैं कानुपर आ चुका था। यह मेरी दूसरी पुस्तक थी और इसका नाम था ‘पैनेसिया कम्प्यूटर कोर्स’। यह पुस्तक इतनी सफल रही कि इसके पहले संस्करण की 1100 प्रतियाँ केवल दो माह में ही समाप्त हो गयीं।
अब मुझे उम्मीद थी कि वे उसका तत्काल दूसरा प्रिंट निकालेंगे, लेकिन उसमें वे बहुत समय लगा रहे थे और मेरा कीमती समय नष्ट हो रहा था। इसका दूसरा कारण यह भी था कि इस पुस्तक में जिन प्रोग्रामों के बारे में बताया गया था, जैसे डाॅस, वर्ड स्टार, लोटस 1-2-3, डीबेस-3, प्रिंट शाॅप आदि, उनका उपयोग समाप्त होने लगा था, क्योंकि विंडोज आधारित कम्प्यूटर बाजार में आने लगे थे। इसलिए मैं चाहता था कि जल्दी ही इसका दूसरा संस्करण निकाल दिया जाये, जिसके लिए मैंने विंडोज पर एक अध्याय भी लिखकर भेज दिया था। लेकिन उपकार प्रकाशन का सबसे अधिक जोर प्रतियोगिताओं की पुस्तकों पर होता है। इसलिए उन्होंने इस पुस्तक को छापने में बहुत समय लगा दिया था तथा दूसरे संस्करण को छापने में और भी अधिक समय लगा रहे थे। इसलिए मैंने यही ठीक समझा कि अब दूसरा प्रकाशक खोजा जाये।
तभी मेरा सम्पर्क आगरा के एक अन्य प्रकाशक विनोद पुस्तक मन्दिर से हुआ। उन्होंने पहले मुझे बच्चों के लिए कम्प्यूटर की पुस्तकें लिखने का आदेश दिया। मैं उनके आदेश के अनुसार पुस्तकें तैयार करने लगा। तभी उ.प्र. सरकार ने तय किया कि कम्प्यूटर को एक विषय के रूप में इंटरमीडियेट की कक्षाओं में पढ़ाया जाएगा। तब हमने यह उचित समझा कि किसी अन्य प्रकाशक की पुस्तक के सामने आने से पहले ही इंटरमीडियेट के लिए अपनी पुस्तक बाजार में लगा दी जाए। इससे मैंने बच्चों की पुस्तकों का काम रोककर इंटर की पुस्तक का कार्य प्रारम्भ कर दिया। दो-तीन माह में ही कक्षा 11 की एक पुस्तक छपकर आ गयी। परन्तु उस समय तक सरकार की घोषणा मात्र कागजों पर ही रही अर्थात् वास्तव में इंटर में कम्प्यूटर की पढ़ाई कहीं प्रारम्भ नहीं हुई। इससे इस पुस्तक को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। जिसके कारण कक्षा 12 के लिए पुस्तक लिखने का कार्य हमने रोक दिया। लेकिन मुझे यह लाभ अवश्य हुआ कि मेरी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी थीं और मैं अब अन्य प्रकाशकों से भी सम्पर्क कर सकता था। वैसे बच्चों की पुस्तकें लिखने का कार्य भी चल रहा था और मैं उनको क्रमशः प्रकाशक को भेज रहा था। तभी नये प्रकाशकों से सम्पर्क करने के लिए मैंने कम्प्यूटर सोसाइटी ऑफ इंडिया के मासिक न्यूज लैटर सी.एस.आई. कम्यूनिकेशन्स में एक छोटा सा विज्ञापन दिया।
उस विज्ञापन के आधार पर मुझे दो पत्र मिले। इनमें एक पत्र मै. पुस्तक महल, दिल्ली के स्वामी श्री राम अवतार जी गुप्त का था। उनके द्वारा प्रसिद्ध ‘रैपिडैक्स इंगलिश स्पीकिंग कोर्स’ नामक पुस्तक छापी गयी है, जो बहुत सफल रही है। उन्होंने ही ‘रैपिडैक्स कम्प्यूटर कोर्स’ नामक एक पुस्तक भी छाप रखी थी, जो उन्हीं प्रोग्रामों के बारे में थी, जिनके बारे में मेरी ‘पैनेसिया कम्प्यूटर कोर्स’ नामक पुस्तक उपकार प्रकाशन, आगरा ने छापी थी। गुप्त जी ने मुझे मिलने के लिए दिल्ली बुलाया और यह भी कहा कि अब तक मेरी जो पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं उनकी प्रति दिखाने के लिए साथ लेकर आऊँ। शीघ्र ही मैं कानपुर से गोमती एक्सप्रेस में चढ़कर दिल्ली पहुँच गया और उनसे मिला।
मेरी तब तक छप चुकीं तीनों पुस्तकों को देखकर श्री गुप्त बहुत प्रसन्न हुए और मुझे पुस्तकें लिखने का ऑर्डर देने को तैयार हो गये। उन्होंने मुझसे पूछा कि पुस्तकें किस तरह लिखते हो। तो मैंने बताया कि मैं कागज पर लिखता हूँ और पांडुलिपि प्रकाशक को भेज देता हूँ, जिसको वे अपने कर्मचारियों से कम्प्यूटर पर तैयार करा लेते हैं। उन्होंने कहा कि इसमें तो बहुत समय लगेगा, इसलिए अच्छा हो कि आप कम्प्यूटर पर लिखा करें और फिर हमें साॅफ्टकाॅपी भेजें। मैंने कहा कि मेरे पास कम्प्यूटर नहीं है, फिर भी मैं बाहर किसी अन्य व्यक्ति से कम्प्यूटर पर तैयार करा दूँगा। इससे वे प्रसन्न हो गये।
तब मैंने उनसे कहा कि मेरी दो शर्तें हैं- एक, सभी पुस्तकें मेरे नाम से छपेंगी यानी पुस्तक में मेरा नाम लेखक के रूप में अवश्य होना चाहिए, क्योंकि मैं भूतलेखन नहीं करूँगा। दूसरी, मैं सभी पुस्तकें राॅयल्टी के आधार पर दूँगा, भले ही उसकी एक भी प्रति न बिके अर्थात् पेज के हिसाब से भुगतान नहीं लूँगा। उनको मेरी पहली शर्त पर कोई आपत्ति नहीं थी, लेकिन दूसरी शर्त सुनकर वे सकते में आ गये। उस समय तक (और आज तक भी) किसी भी लेखक ने उनसे राॅयल्टी नहीं माँगी थी। सबको वे पृष्ठों के आधार पर ही भुगतान करते थे और आज भी करते हैं। लेकिन मेरे आग्रह को देखते हुए वे राॅयल्टी आधार पर तैयार हो गये। हालांकि राॅयल्टी की दर मात्र 6 प्रतिशत तय हुई, वह भी छपी हुई कीमत पर नहीं बल्कि कमीशन काटकर प्राप्त हुई कीमत पर। इसका अर्थ है कि यदि पुस्तक की छपी हुई कीमत 100 रु है और उस पर वे 33 रु. कमीशन दुकानदारों को देते हैं, तो मुझे शेष 67 रु. का 6 प्रतिशत अर्थात् लगभग 4 रुपये राॅयल्टी मिलेगी। इस तरह राॅयल्टी की प्रभावी दर मात्र 4 प्रतिशत थी। फिर भी मैं संतुष्ट था, क्योंकि पुस्तक महल का बेचने का नेटवर्क बहुत बड़ा है और मुझे प्रत्येक पुस्तक बड़ी संख्या में बिकने की उम्मीद थी।
गुप्त जी ने मुझे पुस्तक लिखने के ऑर्डर के साथ ही दो नमूना पुस्तकें भी दीं, जो दूसरे प्रकाशकों ने छापी थीं और वे चाहते थे कि मैं उनसे भी अच्छी पुस्तक तैयार कर दूँ। मैंने उनसे कहा कि मैं निश्चित ही आपकी उम्मीद से भी अधिक अच्छी पुस्तक लिख दूँगा और कम्प्यूटर पर तैयार करा दूँगा। उन्होंने भी अपनी एक शर्त लगा दी, वह यह कि मैं अपनी पुस्तकें किसी अन्य प्रकाशक को नहीं दूँगा, नहीं तो वे सारा भुगतान रोक देंगे। मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि जब तक आप काम देते रहेंगे, तब तक मैं पुस्तकें केवल आपके लिए लिखूँगा। यदि आपके पास काम नहीं होगा, तभी मैं किसी अन्य प्रकाशक के बारे में सोचूँगा। इस पर वे संतुष्ट हो गये।
दिल्ली से मैं सीधा आगरा गया, क्योंकि वहाँ कुछ दिन रुकने की योजना थी। वहाँ मैंने अपने घर वालों को बताया कि मैं दिल्ली में क्या बात करके आया हूँ, तो वे बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें कुछ आश्चर्य भी हुआ कि मैं इस तरह की बातें भी कर लेता हूँ।
आगरा से कानपुर लौटकर मैं इस पुस्तक को कम्प्यूटर पर तैयार कराने में जुट गया। उस समय मेरे पास कोई कम्प्यूटर नहीं था और पेजमेकर या क्वार्क एक्सप्रेस का भी कोई ज्ञान नहीं था। इसलिए मैंने इसको तैयार करने का कार्य श्री मनीष श्रीवास्तव को सोंपा, जो हमारे बैंक का डाटा प्रविष्टि का कार्य किया करते थे और उनको पेजमेकर का अच्छा ज्ञान भी था। वे बड़े चौराहे के पास ही रहते थे, इससे मुझे उनसे मिलने जाने की भी सुविधा थी। तब मैंने यह नियम बनाया कि ऑफिस के समय के बाद साढ़े पाँच या 6 बजे उनके पास चला जाता था और अपनी पुस्तक टाइप कराता था। जैसे-जैसे पुस्तक टाइप होती जाती थी, मैं उसका प्रूफ भी जाँच करता जाता था और अपने सामने ठीक कराता था। पुस्तक लगभग 450 पृष्ठों की थी। मुझे आशा थी कि अधिक से अधिक 2 या 3 महीने में यह पूरी हो जाएगी। परन्तु मनीष जी और उनके पार्टनर श्री संदीप दीक्षित और भी कई काम करते रहते थे। इससे मेरा कार्य देरी से होता था। इसलिए लगभग 6 माह में वे काम पूरा कर पाये। फिर मैंने उसकी सीडी बनवाकर दिल्ली भेज दी।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’
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