आत्मकथा भाग-2 परिशिष्ट ‘ख’ - मेरी जापान यात्रा (अंश 8)
पहली बार मैं रेल में तब चढ़ा जब हमें सुकूबा जाना था। करीब 11 बजे हम रेलवे स्टेशन पहुँचे। वहाँ से टिकट लेकर गाड़ी में बैठकर चले। उससे पहले ही हमने रेलवे स्टेशन से अपने लिए खाने पीने की चीजें खरीद ली थीं। मैंने एक तरह की चिप्स तथा सैंडविच खरीदे। साथ ही दो गिलास पानी भी पैक करवा लिया (जी हाँ, पानी)। मेरे दुर्भाग्य से सैंडविचों में मीट था। इसलिए मैंने वे श्री हिरानो को दे दिये। केवल चिप्स खाकर और दो गिलास पानी पीकर मैंने अपना काम चलाया।
करीब 1 बजे हम सुकूबा स्टेशन पर उतरे। वहाँ से टैक्सी में विज्ञान नगर गये। वहाँ पहले हमने फोटो खिंचवाये। कैमरा तब भी मेरे पास नहीं था। श्री हिरानो ने ही ज्यादातर फोटो खींचे। तभी उस सेंटर की एक देवी जी, जिनकी उम्र 50 के आस-पास रही होगी, हमें लेने आ गयीं।
सबसे पहले हम एक विभाग में पहुँचे, जहाँ एक सज्जन मुख्य शोधकर्ता हैं। वे कम्प्यूटर साॅफ्टवेयर में जापानी भाषा के अधिकाधिक प्रयोग पर शोध कर रहे हैं और एक विलक्षण तरीके से अंग्रेजी से जापानी तथा जापानी से अंग्रेजी में अनुवाद पर भी शोध कर रहे हैं। उनका विषय मेरी रुचि का था, इसलिए मैंने बड़ी दिलचस्पी से सब देखा।
उसके बाद हमें एक वीडियो फिल्म दिखायी गयी, जिसमें विज्ञान नगर की विद्युत तकनीकी प्रयोगशाला (Electro Technical Laboratory) में चल रहे शोध कार्यों का परिचय दिया गया था। वहीं पर सुपर कन्डक्टरों पर कार्य हुआ है और चल रहा है, जिनके कारण सुपर कम्प्यूटर अस्तित्व में आये हैं। वहाँ कई ऐसे-ऐसे शोध कार्य भी चल रहे हैं जहाँ तक पहुँच पाने में भारत को अभी 50 साल और लगेंगे। वहाँ के डायरेक्टर साहब से भी हमारा परिचय हुआ।
करीब 3 बजे हम वहाँ से विदा हुए। दो टैक्सियों में हम फिर स्टेशन आये और लगभग 5 बजे टोकियो पहुँच गये। रास्ते के दृश्य हमारे यहाँ जैसे ही थे। अन्तर केवल प्रगति का है। हमारे यहाँ झोपड़ियाँ और पशु दिखायी पड़ते हैं, जबकि यहाँ कारखाने, मशीनें और कारें जगह-जगह दिखायी पड़ती हैं। खेत भी हैं, जो सब आयताकार होते हैं और काफी हरियाली भी है।
मैंने साइकिल पर स्कूल से लौटते हुए बच्चे भी देखे। यदि एक साइकिल पर दो बच्चे थे, तो दूसरा बच्चा पीछे वाले पहिये की धुरी पर दोनों ओर पैर रखकर खड़ा होता है और चलाने वाले के कंधे पकड़े रहता है। वहाँ साइकिलों में पीछे कोई करियर नहीं होता। केवल आगे करियर अवश्य लगा होता है। शहरों में मुख्य सड़कों पर साइकिल चलाने की अनुमति नहीं होती। उनको केवल फुटपाथ पर चलाया जा सकता है।
करीब 9 बजे हम अपने होटल में आये। रास्ते में कुछ खाने की चीज भी खरीदते लाये, जिसे खाकर हम सो गये। अगले दिन हमें 8 बजे जाना था।
24 अक्तूबर, 1990 (बुधवार)
इस दिन हमें एक कांफ्रेंस में जाना था, जो दिन भर चलनी थी। श्री हिरानो 8 बजे आ गये। आज थोड़ी बारिश हुई थी। इसलिए हमने होटल से प्लास्टिक का एक-एक छाता उधार ले लिया कि क्या पता कब दुबारा बरसना शुरू हो जाये। इस बार हमें टोकियो की सब-वे रेलवे से जाना पड़ा। यह अनुभव मजेदार रहा। ढेर सारी जापानी लड़कियाँ और लड़कों को नजदीक से देखा। सब अपने-अपने में मस्त।
यहाँ लोग बातें कम करते हैं। ज्यादातर चुपचाप पढ़ते रहते हैं या ऊँघते रहते हैं। हाँ कुछ लड़के-लड़कियों के जोड़े जरूर गुफ्तगू में व्यस्त दिखे। यहाँ की लड़कियाँ काफी सुन्दर लगती हैं। पाउडर लिपस्टिक सबके चेहरे पर पुता होता है, परन्तु अश्लीलता बिल्कुल नहीं। लड़कियाँ पूरे कपड़े पहनती हैं। कोई-कोई जोड़ा कमर में हाथ डाले भी मिल जाते हैं, पर ऐसे कम होते हैं।
यहाँ की लड़कियां भारत की लड़कियों की तरह ही शर्माती हैं। एक-दो बार मैंने जान-बूझकर किसी सुन्दर लड़की की ओर ध्यान से देखा, तो वह बुरी तरह शर्मा गयी और मुँह फेर लिया। विदेशियों की ये मदद खूब करते हैं, परन्तु अपनी ओर से ज्यादा ध्यान नहीं देते। यहाँ लड़के-लड़कियाँ दोनों बहुत सिगरेट पीते हैं। नयी सभ्यता की और भी सभी बुराइयाँ यहाँ हैं, परन्तु औसत लड़के-लड़कियाँ नशा नहीं करते। शराब कम लड़कियाँ ही पीती हैं।
करीब 9 बजे हम उस बिल्डिंग में पहुँच गये, जहाँ कांफ्रेंस होनी थी। यह बिल्डिंग शायद टोकियो की सबसे महँगी कांफ्रेंस की जगह है। इसे तेपिया (TEPIA) पैवेलियन कहते हैं। ऊपर एक बड़ा हाॅल है, जिसमें स्टेज, पर्दा, लाइट, माइक आदि की सब नयी से नयी सुविधाएँ हैं। नीचे रेस्तरां हैं, जहाँ काफी महँगा खाना मिलता है।
सबसे पहले हमने अपनी छतरियाँ नीचे रखीं। यहाँ ऐसे ताले बने हुए हैं जिनमें आप अपनी छतरी फँसाकर ताला लगा सकते हैं और ताली ले जा सकते हैं। बाद में जब आप लौटें तो वही ताली उसी जगह लगाकर अपना छाता निकाल लें। प्रत्येक ताले-ताली पर नम्बर पड़े हुए हैं इसलिए भूल की कोई गुंजाइश नहीं और न चोरी का डर। वैसे यहाँ छातों की चोरी भी कोई करता नहीं।
उस कांफ्रेंस का दृश्य अन्य कांफ्रेंसों जैसा ही था, जिनमें मैं पहले भी अनेक बार भाग ले चुका था। अन्तर केवल तकनीक का था। प्रत्येक श्रोता को एक रेडियो जैसी मशीन दी गयी थी, जिसका एक तार कान में लगा लेते हैं। उससे आप वक्ता का भाषण आराम से सुन सकते हैं। इसमें 9 चैनल भी थे। यह शायद ऐसी कांफ्रेंसों के लिए होता है जिनमें कई भाषाओं में कार्यवाही चल रही हो। वक्ता चाहे किसी भी भाषा में बोल रहा हो आप अपने चैनल पर अपनी ही भाषा में उसका अनुवाद उसी समय सुन सकते हैं। ऐसा इस प्रकार सम्भव होता है कि प्रत्येक वक्ता का भाषण पहले से तय तथा छपा हुआ होता है और उसके अनुवाद भी उपलब्ध कराये जाते हैं। यह मशीन मेरे किसी काम की नहीं थी, इसलिए मैंने उसे उठाकर एक तरफ रख दिया। जिस सीट पर मुझे बैठाया गया था, उसके सामने वाली मेज पर मेरे नाम की तख्ती रखी थी, क्योंकि मैं विशेष आमन्त्रितों में से एक था।
कांफ्रेंस का मुख्य विषय था- ‘एशिया के देशों में सूचना तकनीक के मानकीकरण की योजनाएं’। एशिया के अनेक देशों को इसमें अपने अपने देश की स्थिति की रिपोर्ट पेश करनी थी। इनमें से भारत का प्रतिनिधित्व नेशनल इन्फोर्मेटिक्स सेन्टर के संयुक्त निदेशक श्री वी.के. गुप्ता ने किया था। उनका प्रस्तुतीकरण सन्तोषजनक था। अन्य देशों में दक्षिण कोरिया तथा जापान का प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा था। वैसे यह सारी कार्यवाही उबाऊ थी, क्योंकि सबके छपे हुए भाषण सामने रखे थे। उन्हें सुनना या देखना कम से कम मेरे लिए तो बहुत उबाने वाला था। किसी तरह मैं इसे झेल गया।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल
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