आत्मकथा भाग-2 अंश-40
उन्हीं दिनों मुझे अखबारों में सम्पादक के नाम पत्र लिखने का शौक लग गया था। इसकी शुरूआत कुछ इस प्रकार हुई थी कि जब मैं लखनऊ में था, तो ‘जनसत्ता’ अखबार मँगाकर पढ़ा करता था। तब उसे बहुत निष्पक्ष अखबार माना जाता था। तभी मैंने भोपाल गैस त्रासदी पर एक व्यंग्यात्मक कविता उसके सम्पादक को लिख भेजी। आश्चर्य कि वह छप भी गयी। मेरे कई परिचितों ने भी उस कविता को पढ़ा था और उसकी प्रशंसा की थी। वह कविता मैं नीचे दे रहा हूँ-
भारत चलो
दुनिया के शोषको और हत्यारो एक हो
और भारत की ओर चलो
यहाँ आजकल आपकी मस्ती ही मस्ती है
क्योंकि इंसानों की जान यहाँ सबसे सस्ती है।
हिटलर!
अब तू भी अपनी कब्र से उठ जा
और भारत आकर आबादी घटाने में जुट जा।
यहीं पर अपने गैस चैम्बर बना
यहूदी तो तुमने बहुत मारे होंगे
अब भारतीयों की हत्या का मजा लूट !
एक जान की कीमत है केवल तीन हजार
और गाँधी जयन्ती पर विशेष छूट !!
(जनसत्ता, दिल्ली, दि. 4.4.1989)
दुनिया के शोषको और हत्यारो एक हो
और भारत की ओर चलो
यहाँ आजकल आपकी मस्ती ही मस्ती है
क्योंकि इंसानों की जान यहाँ सबसे सस्ती है।
हिटलर!
अब तू भी अपनी कब्र से उठ जा
और भारत आकर आबादी घटाने में जुट जा।
यहीं पर अपने गैस चैम्बर बना
यहूदी तो तुमने बहुत मारे होंगे
अब भारतीयों की हत्या का मजा लूट !
एक जान की कीमत है केवल तीन हजार
और गाँधी जयन्ती पर विशेष छूट !!
(जनसत्ता, दिल्ली, दि. 4.4.1989)
मुझे इसके छपने की आशा नहीं थी, लेकिन जब यह छप गयी तो मुझे बहुत सन्तोष हुआ। तब मैंने नियमित रूप से समाचार पत्रों में लिखने का निश्चय कर लिया। मुख्य रूप से मैं जनसत्ता (दिल्ली) और लखनऊ-वाराणसी के स्थानीय संस्करणों वाले अखबारों जैसे अमर उजाला, दैनिक जागरण, आज, गांडीव आदि में लिखा करता था। मेरे अधिकतर पत्र छप भी जाते थे, हालांकि सम्पादक उनमें अपने-अपने हिसाब से काट-छाँट करते रहते थे।
उन दिनों श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन पूरे जोर-शोर से चल रहा था। राष्ट्रवादी विचारों का कार्यकर्ता होने के नाते मैं आर्यसमाजी और मूर्तिपूजा विरोधी होने पर भी इस मंदिर के लिए चल रहे आन्दोलन का पूरा समर्थन करता था। अखबारों में भी मैं इसी के पक्ष में अनेक प्रकार के तर्क देते हुए पत्र लिखता था। प्रायः मेरे ऐसे अधिकांश पत्र छप जाते थे। ‘जनसत्ता’ में तो एक समय मेरी ऐसी साख हो गयी थी कि मैं जो भी लिख भेजता था, वह सब छप जाता था, हालांकि थोड़ी काट-छाँट करके। वाराणसी में ‘गांडीव’ नामक एक सायंकालीन समाचारपत्र है, जो काफी संख्या में छपता है और दूर-दूर के गाँवों में जाता है। उसमें मेरे सभी पत्र बिना किसी काट-छाँट के छाप दिये जाते थे। कई बार मेरे राष्ट्रवादी विचारों को पढ़कर बहुत से सेकूलर हिन्दू और मुसलमान तिलमिला जाते थे और अपनी तीखी प्रतिक्रियाएँ देते थे।
एक बार सरदार खुशवन्त सिंह ने अपने साप्ताहिक काॅलम ‘ना काहू से दोस्ती’ में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर आन्दोलन की आलोचना करते हुए लेख लिखा था और अन्त में किसी शायर की निम्नलिखित पंक्तियाँ छापी थीं-
सरकुशी की थी किसी महमूद ने सदियों पहले,
इसलिए खूब खबर ली मेरे सिर की तुमने।
चंद पत्थर किसी बाबर ने गिराये थे कभी
ईंट से ईंट बजा दी मेरे घर की तुमने।।
सरकुशी की थी किसी महमूद ने सदियों पहले,
इसलिए खूब खबर ली मेरे सिर की तुमने।
चंद पत्थर किसी बाबर ने गिराये थे कभी
ईंट से ईंट बजा दी मेरे घर की तुमने।।
इस लेख के जवाब में मैंने एक लम्बा और करारा लेख ‘बाबर के वारिस’ शीर्षक से कई अखबारों को भेजा था, जो अधिकांश जगह छप भी गया। इसमें मैंने ऊपर की पंक्तियों के उत्तर में निम्नलिखित पंक्तियाँ प्रस्तुत की थीं-
कासिम गोरी गजनवी बाबर के नाम रटकर
फिजां खराब की है मेरे शहर की तुमने।
श्रीराम के मुकाबिल बाबर को खड़ा करके
सद्भावना मिटा दी मेरे जिगर की तुमने।।
कासिम गोरी गजनवी बाबर के नाम रटकर
फिजां खराब की है मेरे शहर की तुमने।
श्रीराम के मुकाबिल बाबर को खड़ा करके
सद्भावना मिटा दी मेरे जिगर की तुमने।।
मेरे इस जवाब के छपने से मुसलमानों में बड़ी तीखी प्रतिक्रिया हुई। मेरे विरोध में अनेक पत्र छपे। एक मुसलमान सज्जन ने तो यहाँ तक लिख दिया कि ये ‘विजय कुमार सिंघल’ नाम के भाई अपनी बातों से हिन्दू-मुसलमानों के बीच की खाई को और भी चौड़ा किये दे रहे हैं।
उन दिनों ‘जनसत्ता’ के ‘चौपाल’ स्तम्भ में कानपुर के एक बीमा कर्मचारी सज्जन श्री त्रिलोकी नाथ शुक्ल की तुकबंदियाँ लगभग रोज ही छपा करती थीं। वे चौपाई-दोहे की तर्ज पर राजनीति के बारे में बहुत फूहड़ तुकबन्दी किया करते थे और उसके अन्त में यह पंक्ति जोड़ देते थे- ‘सरासर डंकमार की जय’। जब काफी समय तक उनकी तुकबंदियाँ बन्द न हुईं, तो मैंने उन्हीं की तर्ज पर एक पैरोडी लिख मारी, जो नीचे दे रहा हूँ-
शुक्ला तिरलोकी के नाथा। करें रात-दिन पच्चीमाथा।।
नगरी कानपुर्र के बासी। तुक्कड़ कलमघिस्सु बकवासी।।
खोपड़ि सेकूलर मति मंदी। रोज करें घटिया तुकबंदी।।
राजनीति की कीचड़ दल-दल। तामें धसें लपकि सिर के बल।।
जनसत्ता के सम्पादक जी। छापें यह बक-बक नित-नित ही।।
भेजा चाटें नित्य ही कागज करें खराब।
पाठक पागल है गये अब तो रुको जनाब।।
सरासर बक्कवास कीजै?
शुक्ला तिरलोकी के नाथा। करें रात-दिन पच्चीमाथा।।
नगरी कानपुर्र के बासी। तुक्कड़ कलमघिस्सु बकवासी।।
खोपड़ि सेकूलर मति मंदी। रोज करें घटिया तुकबंदी।।
राजनीति की कीचड़ दल-दल। तामें धसें लपकि सिर के बल।।
जनसत्ता के सम्पादक जी। छापें यह बक-बक नित-नित ही।।
भेजा चाटें नित्य ही कागज करें खराब।
पाठक पागल है गये अब तो रुको जनाब।।
सरासर बक्कवास कीजै?
यह पैरोडी मैंने ‘जनसत्ता’ को भेजी और उसकी एक प्रति सीधे शुक्ला जी को भी भेज दी। जैसी कि मुझे आशंका थी, ‘जनसत्ता’ ने तो उसे नहीं छापा, लेकिन शुक्ला जी पर उसका पूरा असर हुआ और कुछ दिन बाद ही ‘जनसत्ता’ में उनकी तुकबंदियां छपना बन्द हो गयीं।
मैं राममंदिर आन्दोलन के समर्थन में तो अपने विचार प्रकट करता ही था, तथाकथित सेकूलर दलों के नेताओं की भी खिल्ली उड़ाते हुए भी पत्र लिखता था, जो छप भी जाते थे। ऐसे लोगों के नामों की एक लम्बी सूची है- मुलायम सिंह, लालू प्रसाद, चन्द्र शेखर, राजीव गाँधी, वी.पी. सिंह, सोनिया गाँधी, प्रियंका बढेरा (गाँधी), नरसिंह राव, चन्द्रास्वामी, भीमसिंह, बोम्मई, अजीत सिंह आदि। कांग्रेस की मैं विशेष तौर पर खिल्ली उड़ाता था। ऐसे चुने हुए पत्रों की कतरन मैं यहाँ दे रहा हूँ, ताकि आप भी उनको पढ़कर आनन्द उठा सकें।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’












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