आत्मकथा भाग-2 अंश-19

लखनऊ में जिन दूसरे प्रचारक के घनिष्ट सम्पर्क में मैं रहा, वे हैं मा. स्वांत रंजन जी मिश्र। वे संघ परिवार में ‘स्वांत जी’ के नाम से लोकप्रिय और सर्वसम्मानित हैं। उनके बारे में कुछ लिखना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। देखने में अत्यन्त सरल, सौम्य, हँसमुख और संघकार्य में अत्यन्त समरस। वे समस्त संघ कार्यकर्ताओं के प्रेरणास्रोत हैं। प्रारम्भ में वे हमारे विभाग प्रचारक थे और हमारे नगर में प्रायः आया करते थे। कई बार सायंकाल वे मेरे पास आते थे, तो जो भी मैं बना पाता था, उसे प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करते थे।
उनके साथ मेरे कई संस्मरण हैं। उनमें से एक संस्मरण लिखने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। एक बार रविवार के दिन दोपहर को वे मेरे निवास पर पधारे। भोजन वे कहीं पा चुके थे और वहाँ कुछ देर विश्राम के लिए आ गये थे। 2 बजे उन्हें किसी कार्यक्रम या बैठक में जाना था। मैंने उनके लिए फोल्डिंग पलंग बिछाना चाहा, परन्तु वे जमीन पर ही दरी बिछाकर लेट गये। मैं एक किताब पढ़ रहा था। जब दो बजने में केवल 2 मिनट रह गये, तब मैंने सोचा कि उन्हें जगा दूँ। लेकिन फिर सोचा कि थोड़ी देर और सो लेने दो, क्योंकि वे प्रातः 5 बजे के निकले हुए थे। यह सोचकर मैंने उन्हें नहीं जगाया। लेकिन यह देखकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि दो बजते ही वे एकदम उठ बैठे और अपना बैग उठाकर चलने के लिए तैयार हो गये। मैंने कहा भी कि थोड़ी देर और लेट लेते, परन्तु नहीं, क्योंकि संघकार्य आराम से अधिक महत्वपूर्ण है। ऐसे प्रचारकों के समक्ष कौन नतमस्तक नहीं होगा?
मा. स्वांत जी बाद में अवध प्रांत के सह प्रांत प्रचारक बने और जब कानपुर तथा लखनऊ अलग-अलग प्रांत बन गये, तो वे लखनऊ (अवध) प्रांत के प्रांत प्रचारक बना दिये गये। काफी समय तक उन्होंने यह कठिन दायित्व निभाया। आजकल वे बिहार क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक का दायित्व निभा रहे हैं और उनका केन्द्र पटना में है।
(पादटीप- मा. स्वांत रंजन जी वर्तमान में संघ के अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख का गुरुत्व दायित्व निभा रहे हैं।)


मा. जय गोपाल जी उस समय हमारे प्रान्त प्रचारक थे। वे मुझे बहुत प्यार करते थे। उन्होंने एक बार मुझे एक हीयरिंग ऐड (कान की मशीन) भी दी थी, परन्तु मैं उसका कोई लाभ नहीं उठा सका।
(पादटीप- मा. जय गोपाल जी का देहान्त हो चुका है।)
संघ के प्रचारकों के जो उदाहरण मैंने दिये हैं, वे विरले नहीं हैं। लगभग सभी संघ प्रचारक एक-दूसरे से बढ़कर कर्मठ, हँसमुख, चरित्रवान्, सरल और त्यागी होते हैं। वे लौकिक अर्थों में भले ही संन्यास ग्रहण न करते हों, परन्तु कर्म से वे किसी संन्यासी से कम नहीं होते। सभी प्रकार के मोह, ममता, आकांक्षा और परिवार तक को छोड़कर प्रायः आजीवन अविवाहित रहते हुए वे अपनी पूरा जीवन संघकार्य में लगा देते हैं। देश और धर्म की सेवा में जीवन खपा देने वाले श्रेष्ठ जन ही संघ के प्रचारक बनते हैं। कोई उनकी विचारधारा से सहमत या असहमत हो सकता है, लेकिन उनके निस्पृह चरित्र और त्याग पर कोई उँगली नहीं उठा सकता। यही कारण है कि वे लाखों गृहस्थी कार्यकर्ताओं का विश्वास जीत लेते हैं और उनके लिए प्रेरणास्रोत बनते हैं।
संघ के प्रचारक स्वयं संघप्रणेता डाॅ. हेडगेवार जी से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। डाॅ. केशव बलीराम हेडगेवार संघ के संस्थापक थे। अत्यन्त साधारण निर्धन परिवार में जन्म लेकर भी वे देश की सेवा में लगे रहते थे। एम.बी.बी.एस. तक की शिक्षा प्राप्त करके वे डाक्टर बने थे। अगर वे चाहते तो साधारण डाक्टरों की तरह चिकित्सा कार्य करते हुए यथेच्छ धन अर्जित कर सकते थे और विवाह आदि करके परिवार बसा सकते थे। परन्तु उन्होंने अपनी डाक्टरी से कभी एक पैसा भी नहीं कमाया और आजीवन अविवाहित रहते हुए हिन्दू संगठन का कार्य करते रहे।
सन् 1989 में जब डाॅ. हेडगेवार जी की जन्म शताब्दी मनायी जा रही थी, तो बड़े-बड़े साधु-संन्यासियों और शंकराचार्यों तक ने उनके चित्रों पर माल्यार्पण करके और उनको नमन करके स्वयं को धन्य माना था। जब कुछ लोगों ने आपत्ति की कि संन्यासियों को किसी गृहस्थी के सम्मुख नतमस्तक होना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं है, तो एक शंकराचार्य जी ने उत्तर दिया था- ”डा. हेडगेवार भले ही लौकिक अर्थों में संन्यासी नहीं थे, परन्तु आजीवन अविवाहित रहकर और त्यागपूर्ण जीवन अपनाकर उन्होंने देश और समाज को संगठित करने का महान् कार्य किया, इसलिए वे संन्यासियों से भी बढ़कर संन्यासी थे। ऐसे यति-शिरोमणि को नमन करने से किसी मर्यादा का उल्लंघन नहीं होता।“ जब संघ के सामने ऐसे महान् चरित्र आदर्श के रूप में उपस्थित हों, तो उनके प्रचारकों का भी चरित्र और कार्य उत्तम होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है।
मा. स्वांत जी मुझे भी प्रचारक बनने की प्रेरणा दिया करते थे, परन्तु मैं अपनी कमजोरियों को जानता था, इसलिए प्रचारक बनने का साहस नहीं किया। लेकिन मैंने मन ही मन गृहस्थाश्रम में रहते हुए ही अधिक से अधिक संघकार्य करने का संकल्प ले रखा था। वैसे भी मैं प्रतिज्ञाबद्ध स्वयंसेवक हूँ। एक बार सरस्वती शिशु मंदिर, इन्दिरा नगर में हमारे नगर का प्रतिज्ञा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें कई स्वयंसेवकों के साथ मैंने भी आजीवन संघकार्य करने की प्रतिज्ञा ग्रहण की थी। हमें प्रतिज्ञा कराने का कार्य श्री राम उजागिर सिंह जी ने किया था, जिनका उल्लेख ऊपर आ चुका है।
मैं आगे भी अनेक प्रचारकों के घनिष्ठ सम्पर्क में आया हूँ। उनका उल्लेख यथासम्भव आगे करूँगा।
-- डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’

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